कृषि महाविद्यालय धनोरा की छात्रा ने किया कचलोन नर्सरी का शैक्षणिक भ्रमण, सीखे नर्सरी प्रबंधन के गुर
छत्तीसगढ़ कृषि महाविद्यालय धनोरा, दुर्ग की बी.एससी. कृषि चतुर्थ वर्ष की छात्रा लक्ष्मी साहू ने कृषि पत्रकारिता एवं व्यवहार कौशल विषय के अंतर्गत कचलोन (सिमगा) में स्थित नर्सरी का भ्रमण कर नर्सरी प्रबंधन संबंधी महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त कीं। इस दौरान उन्होंने नर्सरी संचालक अमन राठौर से मुलाकात कर पौध उत्पादन, रोग प्रबंधन, सिंचाई व्यवस्था एवं विपणन संबंधी विषयों पर विस्तृत चर्चा की।
अमन राठौर ने बताया कि उनकी नर्सरी की स्थापना लगभग 10 वर्ष पूर्व की गई थी। लगभग 10 एकड़ क्षेत्र में संचालित है अमन जी ने बताया नर्सरी तैयार करने के लिए सबसे पहले उपयुक्त स्थान का चयन करना चाहिए। ऐसी भूमि चुननी चाहिए जहाँ जल निकासी की अच्छी व्यवस्था हो तथा सिंचाई का पर्याप्त साधन उपलब्ध हो। उन्होंने बताया कि भूमि को अच्छी तरह जोतकर भुरभुरी बनाया जाता है और उसमें गोबर की सड़ी हुई खाद या कम्पोस्ट मिलाई जाती है।
इसके बाद क्यारियाँ बनाई जाती हैं। सामान्यतः 1 से 1.2 मीटर चौड़ी क्यारियाँ सुविधाजनक मानी जाती हैं। बीजों को बोने से पहले उनका उपचार करना आवश्यक होता है ताकि रोगों और कीटों से बचाव हो सके। उपचारित बीजों को उचित दूरी पर बोकर हल्की मिट्टी से ढक दिया जाता है। अमन जी ने बताया इस नर्सरी में फलदार, फूलदार, सब्जी एवं सजावटी पौधों का उत्पादन किया जाता है। नर्सरी में आम, जामुन, अमरूद, कटहल तथा सीताफल जैसे फलदार पौधों के लगभग 1000 पौधे तैयार किए जाते हैं।
उन्होंने बताया कि आम के पौधों का प्रवर्धन ग्राफ्टिंग विधि द्वारा तथा अमरूद के पौधों का प्रवर्धन लेयरिंग विधि से किया जाता है। इसके अतिरिक्त नर्सरी में गेंदा, गुलाब तथा अन्य आकर्षक फूलों वाले पौधों का भी उत्पादन किया जाता है। किसानों की मांग को ध्यान में रखते हुए टमाटर, मिर्च, बैंगन एवं गोभी की पौध भी बड़े पैमाने पर तैयार कर विक्रय की जाती है। साथ ही विभिन्न प्रकार के सजावटी पौधे भी उगाए जाते हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग रहती है।
अमन राठौर ने बताया कि पौध उत्पादन के लिए बीज एवं छोटे पौधे रायपुर, पुणे तथा स्थानीय कृषि केंद्रों से मंगाए जाते हैं। पौधों में रोग प्रबंधन के संबंध में उन्होंने जानकारी दी कि आम में एन्थ्रेक्नोज तथा गुलाब में ब्लैक स्पॉट एवं पाउडरी मिल्ड्यू जैसी बीमारियां देखने को मिलती हैं। इन रोगों के नियंत्रण हेतु मैनकोजेब एवं अन्य रासायनिक दवाओं का छिड़काव किया जाता है। और पौधौ की संक्रमित भागों की छंटाई किया जाता है नर्सरी के सफल संचालन में लगभग 10 श्रमिक योगदान दे रहे हैं, जो निराई-गुड़ाई, पौधों की देखभाल एवं अन्य आवश्यक कार्यों का नियमित रूप से निर्वहन करते हैं। सिंचाई के लिए फ्लड इरिगेशन एवं स्प्रिंकलर पद्धति का उपयोग किया जाता है, जिससे पौधों की बेहतर वृद्धि सुनिश्चित होती है।
तैयार पौधों का विक्रय स्थानीय बाजारों, कृषि मेलों तथा सीधे किसानों को किया जाता है। क्षेत्र के अनेक किसान अपनी आवश्यकता के अनुसार सीधे नर्सरी पहुंचकर पौधे खरीदते हैं।
अमन राठौर ने बताया कि नर्सरी व्यवसाय से उन्हें प्रतिवर्ष लगभग 10 लाख रुपये की आय प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि नर्सरी व्यवसाय कृषि क्षेत्र में स्वरोजगार एवं आय बढ़ाने का एक प्रभावी माध्यम है, जिससे किसानों और युवाओं को रोजगार के नए अवसर प्राप्त हो सकते हैं।
इस शैक्षणिक भ्रमण के दौरान छात्रा लक्ष्मी साहू को नर्सरी प्रबंधन, पौध प्रवर्धन तकनीक, रोग एवं कीट नियंत्रण, सिंचाई प्रबंधन तथा कृषि उद्यमिता से जुड़ी व्यावहारिक जानकारियां प्राप्त हुईं। यह अनुभव उनके कृषि शिक्षा एवं भविष्य के व्यावसायिक जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा।