हाईकोर्ट से स्टे का मतलब दोषमुक्ति या केस खत्म होना नहीं: अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी
बिलासपुर: आपराधिक मामलों में हाईकोर्ट से ‘स्टे’ (रोक) मिलने को अक्सर आरोपी की दोषमुक्ति या केस का खत्म होना समझ लिया जाता है, जबकि कानूनी दृष्टि से यह धारणा पूरी तरह गलत है। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी के अनुसार, स्टे एक अंतरिम न्यायिक संरक्षण है, जिसका अर्थ केवल अदालत की कार्यवाही या किसी विशिष्ट आदेश पर अस्थायी रोक लगाना होता है, न कि आरोपी को निर्दोष घोषित करना।
अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि या दोषमुक्ति केवल मुकदमे के अंतिम निर्णय से तय होती है। स्टे आदेश से अभियोजन का मामला समाप्त नहीं होता, बल्कि निर्धारित सीमा और तय समय तक के लिए प्रक्रिया को रोका जाता है। यदि स्टे आदेश की अवधि समाप्त हो जाती है या अदालत उसे हटा देती है, तो निचली अदालत में सुनवाई पूर्ववत शुरू हो जाती है।
स्टे, जमानत और गिरफ्तारी से राहत में अंतर समझना जरूरी उन्होंने बताया कि आम जनता और पक्षकारों के बीच स्टे को लेकर कई भ्रांतियां रहती हैं:
- जमानत से अलग: यदि आरोपी जेल में है और केवल ट्रायल पर स्टे मिला है, तो वह स्वतः जेल से बाहर नहीं आ सकता; इसके लिए नियमित जमानत आदेश की आवश्यकता होती है।
- गिरफ्तारी से सुरक्षा नहीं: ट्रायल पर रोक का मतलब यह नहीं कि आरोपी की गिरफ्तारी पर भी रोक है, जब तक कि आदेश में गिरफ्तारी से संरक्षण का स्पष्ट उल्लेख न हो।
- सीमित प्रभाव: स्टे आदेश की भाषा (“Till next date” या “Till further orders”) और उसकी शर्तों को पढ़ना अनिवार्य है, क्योंकि रोक केवल आदेशित सीमा तक ही प्रभावी होती है।
अधिवक्ता जोशी ने मीडिया और सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली खबरों को लेकर भी सतर्कता बरतने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि स्टे मिलने पर ‘आरोपी को क्लीन चिट’ या ‘केस खत्म’ जैसी भ्रामक सुर्खियां लगाने से बचना चाहिए और आदेश के वास्तविक विधिक दायरे को ही सामने रखना चाहिए।