बलौदा बाजार। 3 सितंबर 2026 सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की दयनीय स्थिति एक गंभीर समस्या बनी हुई है। जिले के कसडोल ब्लाक के संकुल हसुवा के नवापारा स्कूल समेत कई स्कूलों में जर्जर भवन और बदहाल शौचालयों के कारण बच्चों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

जर्जर भवन: छतें टपकती हैं, दीवारें कमजोर
नवापारा स्कूल की इमारत काफी पुरानी हो चुकी है। कई कमरों की छतों से बारिश के दिनों में पानी टपकता है, जिससे कक्षाएं संचालित करना मुश्किल हो जाता है। दीवारों में दरारें आ चुकी हैं, जिससे भवन के गिरने का खतरा बना रहता है।

सूत्रों के अनुसार, सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कई बार बच्चों को बरामदे या खुले आंगन में बैठाकर पढ़ाना पड़ता है। गर्मी और सर्दी के मौसम में यह व्यवस्था और भी कष्टदायक हो जाती है। कई अभिभावकों ने बताया कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजने में डर महसूस करते हैं, क्योंकि किसी भी समय छत या दीवार गिर सकती है।

शौचालयों की बदहाली: छात्राओं को सबसे ज्यादा परेशानी
स्कूल परिसर में बने शौचालयों की स्थिति और भी चिंताजनक है:
▪️कई शौचालयों के दरवाजे टूटे या गायब हैं
▪️ अंदर गंदगी का अंबार लगा हुआ है
▪️पानी की व्यवस्था न के बराबर है
▪️बिजली कनेक्शन न होने के कारण अंदर अंधेरा रहता है
इन हालातों के कारण बच्चे शौचालय का उपयोग नहीं कर पाते। कई छात्र-छात्राओं को मजबूरन खुले में जाना पड़ता है या फिर वापस घर जाना पड़ता है, जिससे उनकी पढ़ाई बाधित होती है। विशेष रूप से छात्राओं को इस समस्या का सबसे अधिक सामना करना पड़ता है, क्योंकि गोपनीयता और सुरक्षा के अभाव में वे स्कूल में शौचालय जाने से बचती हैं। कई छात्राओं ने बताया कि वे पूरे दिन कुछ खाती-पीती नहीं हैं ताकि उन्हें शौचालय न जाना पड़े।

शिक्षक भी इस व्यवस्था से परेशान हैं। एक शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हम बच्चों को स्वच्छता के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन जब शौचालय ही उपयोग लायक नहीं हैं, तो हमारे लिए बच्चों को समझाना मुश्किल हो जाता है।”
प्रशासनिक कदम: दावे ज्यादा, जमीनी सुधार कम
ऐसी शिकायतें सामने आने के बाद स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग द्वारा समय-समय पर मरम्मत कार्य के दावे किए जाते रहे हैं। कुछ कार्यशालाएं भी आयोजित की गईं, लेकिन जमीनी स्तर पर व्यवस्था में कोई बड़ा सुधार नहीं दिखा।
जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि कई स्कूलों के लिए मरम्मत का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है, लेकिन बजट और तकनीकी स्वीकृति की प्रक्रिया में समय लग रहा है। इस बीच बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ा संकट बरकरार है।
क्या कहते हैं अभिभावक?
स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में दाखिला दिलाने के बाद उन्हें यह सोचकर संतोष होता था कि उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा मिलेगी, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के अभाव में वे अपने बच्चों का भविष्य स्कूल भेजकर खतरे में नहीं डालना चाहते। कई अभिभावक अब निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं, जहां फीस अधिक होने के बावजूद बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
मांग और सुझाव
स्थानीय ग्रामीणों और अभिभावकों ने प्रशासन से निम्नलिखित मांगें की हैं:
1. जर्जर भवनों का तत्काल सर्वेक्षण कराकर उन्हें या तो सुरक्षित किया जाए या नए भवनों का निर्माण किया जाए
2. शौचालयों की मरम्मत और साफ-सफाई के लिए नियमित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए
3. पानी और बिजली की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं
4. छात्राओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अलग और सुरक्षित शौचालय बनाए जाएं
5. स्कूल भवनों के नियमित निरीक्षण की व्यवस्था हो
ग्राउंड रिपोर्ट का सवाल
सरकारी स्कूलों में करोड़ों रुपये की योजनाओं और सुविधाओं के दावों के बावजूद यदि बच्चे जर्जर भवन और बदहाल शौचालय जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, तो सवाल यही है कि स्कूलों की वास्तविक स्थिति की नियमित निगरानी कौन कर रहा है और बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?