छत्तीसगढ़ के सोनाखान तहसील के भूमिहीन मजदूरों के साथ ‘छलावा’? रंगोरा के 37 पात्र हितग्राही किश्त के लिए दर-दर भटकने को मजबूर
बलौदाबाजार/सोनाखान: छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल उठने लगे हैं। ताजा मामला सोनाखान तहसील के ग्राम पंचायत रंगोरा से सामने आया है, जहाँ ‘दीनदयाल उपाध्याय भूमिहीन कृषि मजदूर योजना’ (पूर्ववर्ती न्याय योजना) के तहत पंजीकृत मजदूरों को महीनों से फूटी कौड़ी भी नसीब नहीं हुई है।
पंजीकरण और पात्रता के बावजूद खाते खाली
ग्राम पंचायत रंगोरा में कुल 37 भूमिहीन मजदूर इस योजना के तहत विधिवत पंजीकृत हैं। विभागीय जांच और सत्यापन में इन सभी को ‘पात्र’ पाया गया है। इसके बावजूद, भाजपा सरकार के कार्यकाल में अब तक एक भी हितग्राही के खाते में योजना की राशि नहीं पहुँची है। मजदूरों का आरोप है कि सरकार केवल विज्ञापनों में वाहवाही बटोर रही है, जबकि धरातल पर गरीब मजदूरों को उनके हक का पैसा नहीं मिल रहा।
पंचायत से तहसील तक चक्कर, पर हाथ लगी निराशा
परेशान मजदूर पिछले कई महीनों से पंचायत भवन और सोनाखान तहसील कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं। हितग्राहियों का कहना है कि:
- अधिकारी कोई भी स्पष्ट जवाब देने को तैयार नहीं हैं।
- कार्यालयों में केवल “सर्वर डाउन” या “प्रक्रिया जारी है” जैसे बहाने बनाकर उन्हें लौटा दिया जाता है।
- उचित सलाह या जानकारी के अभाव में मजदूर आर्थिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित महसूस कर रहे हैं।
“कांग्रेस राज में समय पर मिलता था पैसा, अब केवल जुमला”
मजदूरों के बीच वर्तमान भाजपा सरकार के खिलाफ गहरा आक्रोश व्याप्त है। रंगोरा के ग्रामीणों ने तुलना करते हुए कहा कि भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में भूमिहीन मजदूरों को समय-समय पर किश्तें मिल जाती थीं, जिससे उनके घर का खर्च चलता था।
”भाजपा सरकार एक बार फिर ‘जुमले’ की सरकार साबित हो रही है। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए गए थे, लेकिन सत्ता में आते ही भूमिहीन मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। हम खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।”
— रंगोरा के एक पीड़ित मजदूर
प्रशासनिक मौन पर उठते सवाल
ग्रामीणों का सवाल है कि जब सभी 37 मजदूर पात्र हैं, तो तकनीकी बाधा कहाँ आ रही है? क्या यह सरकार की मंशा की कमी है या प्रशासनिक लापरवाही? मजदूरों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही उनके खातों में बकाया राशि नहीं डाली गई, तो वे उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
फिलहाल, रंगोरा के ये 37 परिवार अपनी मेहनत की कमाई और हक के पैसे के लिए सरकार की ओर उम्मीद भरी लेकिन गुस्से वाली नजरों से देख रहे हैं।