साइबर फ्रॉड से बचाव: सावधानी ही सबसे मजबूत सुरक्षा कवच, अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने नागरिकों से की सतर्क रहने की अपील
विशेष संवाददाता नई दिल्ली: डिजिटल युग में जहां बैंकिंग, खरीदारी, निवेश और सरकारी सेवाओं का संचालन ऑनलाइन माध्यम से आसान हुआ है, वहीं साइबर अपराधियों ने भी ठगी के नए और जटिल हथकंडे अपना लिए हैं। फर्जी कॉल, नकली वेबसाइट, फर्जी कस्टमर केयर, लॉटरी और ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी धमकियों के जरिए लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। इस गंभीर समस्या पर अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने आम नागरिकों को जागरूक करते हुए सतर्कता बरतने की अपील की है।
अधिवक्ता जोशी के अनुसार, साइबर फ्रॉड से बचने के लिए केवल तकनीकी समझ होना काफी नहीं है, बल्कि मानसिक सतर्कता और संयम सबसे जरूरी सुरक्षा उपाय हैं। उन्होंने जोर देकर कहा, “डिजिटल सुविधा का उपयोग जरूर करें, लेकिन बिना सत्यापन के किसी पर भी डिजिटल भरोसा न करें।”
- गोपनीय डेटा सुरक्षित रखें: बैंक पासवर्ड, UPI PIN, CVV और OTP किसी भी अनजान व्यक्ति के साथ साझा न करें।
- संदिग्ध लिंक से दूरी बनाएं: WhatsApp, SMS या ईमेल पर आए अनजान लिंक पर क्लिक करने के बजाय आधिकारिक वेबसाइट या ऐप का ही उपयोग करें।
- सर्च इंजन के नंबरों पर अंधा भरोसा न करें: गूगल या सोशल मीडिया से मिले कस्टमर केयर नंबर फर्जी हो सकते हैं; हमेशा आधिकारिक ऐप से ही संपर्क सूत्र निकालें।
- रिमोट एक्सेस न दें: किसी अनजान कॉलर के कहने पर कोई ऐप डाउनलोड न करें और न ही मोबाइल स्क्रीन शेयर करें।
- QR कोड का सच समझें: याद रखें कि QR कोड स्कैन करने से पैसा कटता है, प्राप्त नहीं होता।
- दबाव में न आएं: “खाता बंद हो जाएगा” या “कानूनी कार्रवाई होगी” जैसी चेतावनियों से घबराकर तुरंत पैसे ट्रांसफर न करें।
अधिवक्ता जोशी ने बताया कि यदि कोई व्यक्ति साइबर वित्तीय धोखाधड़ी का शिकार हो जाता है, तो समय पर उठाया गया कदम नुकसान को रोक सकता है।
- तुरंत अपने बैंक या पेमेंट सेवा प्रदाता को सूचित कर खाता या कार्ड ब्लॉक कराएं।
- राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर तुरंत कॉल करें।
- आधिकारिक पोर्टल cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें।
- लेन-देन से जुड़े SMS, स्क्रीनशॉट, ट्रांजेक्शन आईडी और चैट जैसे डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखें और उन्हें मिटाएं नहीं।
अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी (संपर्क: 9893354327) ने साइबर सुरक्षा का मूल मंत्र देते हुए कहा कि किसी भी डिजिटल गतिविधि के दौरान “रुकें — सोचें — सत्यापित करें — फिर कार्रवाई करें” का नियम अपनाकर बड़े आर्थिक और व्यक्तिगत नुकसान से बचा जा सकता है।