चरौदा की प्राथमिक शाला में सुरक्षा भगवान भरोसे, बेजा कब्जा और आवारा मवेशियों का खतरा; पत्राचार के बाद भी प्रशासन बेखबर
पलारी। आजादी के बाद देश ने विकास के कई पड़ाव पार कर लिए, सरकारें बदलीं, जनप्रतिनिधि बदले और प्रशासनिक अधिकारी भी बदलते रहे, लेकिन पलारी ब्लॉक के ग्राम पंचायत चरौदा में संचालित प्राथमिक शाला की बदहाली जस की तस बनी हुई है। वर्ष 1925 से संचालित इस विद्यालय को आज तक अपना अहाता नसीब नहीं हो सका है। सवाल यह है कि जब स्कूल करीब एक सदी पुराना है, तो आखिर इसकी चारदीवारी के लिए जिम्मेदार तंत्र को अब तक नींद से कौन जगाएगा?
विद्यालय में अहाता नहीं होने के कारण स्कूल प्रबंधन को भूमि कब्जे, आवारा मवेशियों और असामाजिक तत्वों की आवाजाही जैसी समस्याओं से लगातार जूझना पड़ रहा है। बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा इतना गंभीर मामला होने के बावजूद जिम्मेदार विभागों की चुप्पी अब सवालों के घेरे में है।
एक बार मंडी बोर्ड से मिली थी मंजूरी, सरकार बदली तो योजना भी गई ठंडे बस्ते में
जानकारी के अनुसार विद्यालय के अहाता निर्माण के लिए एक समय मंडी बोर्ड से स्वीकृति भी मिली थी, लेकिन सरकार बदलते ही यह स्वीकृति निरस्त हो गई। इसके बाद मामला आगे बढ़ने के बजाय सरकारी फाइलों में ही उलझकर रह गया।यानी बच्चों की सुरक्षा का सवाल सत्ता परिवर्तन के साथ बदल गया। सरकार बदली, स्वीकृति गई और स्कूल फिर उसी पुराने हाल में छोड़ दिया गया।
जनपद सभापति ने शिक्षा मंत्री और कलेक्टर को लिखा पत्र
विद्यालय की इस गंभीर समस्या को लेकर जनपद सभापति नीलिमा चरण दास कोशले ने शिक्षा मंत्री और तत्कालीन कलेक्टर, बलौदाबाजार को पत्र के माध्यम से अवगत कराया था। उम्मीद थी कि प्रशासन मामले को गंभीरता से लेते हुए प्राथमिकता के आधार पर अहाता निर्माण की दिशा में कदम उठाएगा।
लेकिन कलेक्टर बदल गए, अधिकारी बदल गए और समय भी गुजरता रहा—नहीं बदली तो सिर्फ स्कूल की तस्वीर।
बच्चों की सुरक्षा से बड़ा क्या इंतजार?
अहाता नहीं होने के कारण स्कूल परिसर किसी भी व्यक्ति या मवेशी के लिए खुला पड़ा है। ऐसे में बच्चों की सुरक्षा को लेकर अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन की चिंता स्वाभाविक है। यदि विद्यालय परिसर में असामाजिक तत्वों की आवाजाही और आवारा मवेशियों का प्रवेश लगातार बना हुआ है, तो किसी अप्रिय घटना का इंतजार आखिर क्यों?
क्या प्रशासन किसी हादसे के बाद जागेगा?
यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि मामला किसी नए भवन या अतिरिक्त सुविधा का नहीं, बल्कि बच्चों की बुनियादी सुरक्षा का है।
सौ साल पुराना स्कूल, लेकिन व्यवस्था आज भी अधूरी
चरौदा की प्राथमिक शाला का इतिहास करीब एक सदी पुराना है। विडंबना देखिए कि जिस देश ने तकनीक, शिक्षा और विकास के क्षेत्र में लंबी छलांग लगाई, उसी देश में करीब 100 साल से संचालित स्कूल आज भी अहाते जैसी बुनियादी सुविधा के लिए सरकारी दरवाजों पर दस्तक दे रहा है।
अंग्रेज चले गए, सरकारें बदल गईं, योजनाएं बदल गईं… लेकिन चरौदा के इस स्कूल का अहाता आज तक नहीं बन पाया।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले को फिर किसी फाइल में दबाता है या बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए अहाता निर्माण के लिए ठोस कार्रवाई करता है।
