बच्चों की फीस बकाया, उधार में चल रही रसोई, निजी मोबाइल से कर रहे सरकारी काम; पलारी के रोजगार सहायकों ने सुनाई अपनी पीड़ा
**पलारी।** ग्रामीण विकास योजनाओं की रीढ़ माने जाने वाले ग्राम रोजगार सहायकों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। गांव-गांव में शासन की योजनाओं को धरातल पर उतारने वाले रोजगार सहायक आज खुद आर्थिक तंगी और उपेक्षा का शिकार होने का आरोप लगा रहे हैं। पिछले चार माह से मानदेय नहीं मिलने से परेशान रोजगार सहायकों ने जनपद पंचायत पलारी के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) को आवेदन सौंपकर लंबित भुगतान की मांग की है। कर्मचारियों का कहना है कि लगातार आर्थिक संकट झेलने के कारण अब हालात ऐसे बन गए हैं कि यदि जल्द भुगतान नहीं हुआ तो वे अपने कार्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो जाएंगे। रोजगार सहायकों का कहना है कि उन्हें वर्तमान में मात्र **8765 रुपए प्रतिमाह मानदेय** मिलता है। बढ़ती महंगाई के इस दौर में यह राशि पहले से ही परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त नहीं थी, लेकिन जब चार-चार महीने तक भुगतान ही न हो तो परिवार चलाना किसी चुनौती से कम नहीं रह जाता। कर्मचारियों का आरोप है कि बच्चों की स्कूल फीस जमा नहीं हो पा रही है, घरेलू खर्च उधार के सहारे चल रहा है और कई परिवारों को आवश्यक जरूरतों में कटौती करनी पड़ रही है।
गांव के विकास की पूरी जिम्मेदारी, लेकिन खुद संकट में
ग्रामीण क्षेत्रों में शासन की योजनाओं का क्रियान्वयन केवल कागजों तक सीमित नहीं होता। इसके पीछे गांव स्तर पर कार्य करने वाले कर्मचारियों की बड़ी भूमिका होती है। रोजगार सहायकों का कहना है कि मनरेगा सहित अनेक योजनाओं की सफलता उनके निरंतर प्रयासों पर निर्भर करती है। तालाब निर्माण कार्यों की निगरानी, मजदूरों की उपस्थिति दर्ज करना, मास्टर रोल तैयार करना, ऑनलाइन प्रविष्टियां करना, प्रधानमंत्री आवास योजना के हितग्राहियों का सत्यापन, मिशन अंत्योदय, जलदूत, ई-केवाईसी, जनगणना, बीएलओ कार्य, सामाजिक सर्वेक्षण और पंचायतों के विभिन्न ऑनलाइन कार्य रोजगार सहायकों द्वारा ही किए जाते हैं। इसके अलावा शासन की नई योजनाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आधारित कार्यों का दबाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है। अधिकांश रोजगार सहायक निजी मोबाइल फोन, निजी इंटरनेट और अपने संसाधनों का उपयोग कर शासन के निर्देशों का पालन करते हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क की समस्या, लंबी दूरी और संसाधनों की कमी के बावजूद वे समय पर कार्य पूर्ण करने का प्रयास करते हैं। इसके बावजूद जब महीनों तक मानदेय नहीं मिलता तो मानसिक और आर्थिक दोनों प्रकार का दबाव बढ़ जाता है।
चार महीने से खाली खाते, बढ़ रही चिंता
रोजगार सहायकों के अनुसार चार माह से मानदेय नहीं मिलने के कारण कई परिवारों की आर्थिक स्थिति गंभीर हो चुकी है। जिन कर्मचारियों का परिवार पूरी तरह इस आय पर निर्भर है, उनके सामने सबसे बड़ी समस्या बच्चों की शिक्षा और घरेलू खर्च को लेकर खड़ी हो गई है। कई रोजगार सहायकों का कहना है कि स्कूलों से फीस जमा करने के लिए लगातार दबाव बनाया जा रहा है। कुछ परिवारों ने रिश्तेदारों और परिचितों से उधार लेकर फीस जमा करने का प्रयास किया, जबकि कई बच्चों की फीस अब भी बकाया है। घरेलू स्तर पर भी हालात आसान नहीं हैं। रसोई का खर्च, बिजली बिल, दवाइयों का खर्च, वृद्ध माता-पिता की देखभाल और अन्य आवश्यक जरूरतों को पूरा करने में परेशानी हो रही है।एक रोजगार सहायक ने बताया कि परिवार को यह भरोसा दिलाना मुश्किल हो रहा है कि मानदेय कब मिलेगा। हर महीने उम्मीद बंधती है, लेकिन भुगतान नहीं होने से निराशा बढ़ती जा रही है।
निजी संसाधनों से चल रहा सरकारी काम
रोजगार सहायकों का कहना है कि डिजिटल युग में पंचायतों का अधिकांश कार्य ऑनलाइन हो गया है। मनरेगा की प्रविष्टियां, ई-केवाईसी, योजनाओं की रिपोर्टिंग, मोबाइल एप पर जानकारी अपलोड करना और विभिन्न पोर्टलों पर डेटा अपडेट करने जैसे कार्य नियमित रूप से किए जाते हैं। इन कार्यों के लिए उन्हें स्वयं का मोबाइल फोन, इंटरनेट पैक और कई बार प्रिंटिंग जैसी सुविधाओं का भी खर्च उठाना पड़ता है। कर्मचारियों का कहना है कि जब मानदेय समय पर नहीं मिलता तो इन खर्चों को वहन करना और अधिक कठिन हो जाता है। उनका आरोप है कि शासन की योजनाओं का अंतिम क्रियान्वयन गांव स्तर पर उन्हीं के माध्यम से होता है, लेकिन उनकी समस्याओं को प्राथमिकता नहीं दी जाती।
-EPF कटौती पर भी उठे सवाल
रोजगार सहायकों ने मानदेय से होने वाली ईपीएफ कटौती को लेकर भी चिंता जताई है। कर्मचारियों का कहना है कि उनके मानदेय से ईपीएफ की राशि तो काटी जाती है, लेकिन कई मामलों में संबंधित खातों में राशि जमा होने को लेकर भ्रम और शिकायतें बनी हुई हैं। उन्होंने मांग की है कि इस मामले की जांच कर स्थिति स्पष्ट की जाए ताकि कर्मचारियों को भविष्य में किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े।
बिना सूचना स्थानांतरण पर नाराजगी
रोजगार सहायकों ने यह भी आरोप लगाया कि कई बार स्थानांतरण आदेश बिना पर्याप्त सूचना और संवाद के जारी कर दिए जाते हैं। कर्मचारियों का कहना है कि ऐसे निर्णयों से कार्य व्यवस्था प्रभावित होती है और व्यक्तिगत स्तर पर भी परेशानियां बढ़ती हैं। उनका मानना है कि किसी भी प्रकार के प्रशासनिक निर्णय से पहले संबंधित कर्मचारियों को सूचना देना और उनकी बात सुनना आवश्यक है।
CEO को सौंपा आवेदन
अपनी मांगों को लेकर रोजगार सहायकों ने जनपद पंचायत पलारी के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को आवेदन सौंपा है। आवेदन में लंबित मानदेय का तत्काल भुगतान कराने, ईपीएफ संबंधी शिकायतों का निराकरण करने तथा अन्य लंबित समस्याओं के समाधान की मांग की गई है। कर्मचारियों ने कहा कि वे टकराव नहीं चाहते, बल्कि केवल अपनी मेहनत का समय पर भुगतान चाहते हैं। उनका कहना है कि यदि उन्हें नियमित मानदेय मिलता रहे तो वे पहले की तरह पूरी निष्ठा के साथ योजनाओं के क्रियान्वयन में लगे रहेंगे।
संघ अध्यक्ष अशवंत मनहरे ने रखी बात
रोजगार सहायक संघ के अध्यक्ष अशवंत मनहरे ने कहा कि रोजगार सहायक गांवों में शासन की योजनाओं को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान परिस्थितियों में कई कर्मचारियों के परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। बच्चों की फीस बकाया है, घरेलू उधारी बढ़ रही है और बढ़ती महंगाई के बीच कम मानदेय में गुजारा करना बेहद कठिन हो गया है। अशवंत मनहरे ने कहा कि रोजगार सहायक सुबह से लेकर देर शाम तक पंचायत और कार्यस्थलों के बीच दौड़भाग करते हैं। मजदूरों की उपस्थिति से लेकर ऑनलाइन प्रविष्टियों तक की जिम्मेदारी निभाते हैं, लेकिन जब मेहनत का भुगतान समय पर नहीं मिलता तो मनोबल प्रभावित होना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि यदि जल्द मानदेय जारी नहीं किया गया तो रोजगार सहायकों के लिए काम जारी रखना मुश्किल हो जाएगा। आर्थिक स्थिति ऐसी बनती जा रही है कि कई कर्मचारी अपने कार्यों से संबंधित खर्च भी वहन नहीं कर पा रहे हैं।
विकसित भारत के सपनों के बीच जमीनी हकीकत
देशभर में विकसित भारत और ग्रामीण विकास को लेकर बड़े लक्ष्य निर्धारित किए जा रहे हैं। गांवों में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार, रोजगार सृजन और डिजिटल प्रशासन को बढ़ावा देने के लिए लगातार नई योजनाएं शुरू की जा रही हैं।
लेकिन जमीनी स्तर पर इन योजनाओं को लागू करने वाले कर्मचारियों का कहना है कि यदि उनकी बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं होगा तो योजनाओं की गति भी प्रभावित हो सकती है।
जानकारों का कहना है किसी भी योजना की सफलता केवल बजट और घोषणाओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसे लागू करने वाले मानव संसाधन की स्थिति पर भी निर्भर करती है। यदि जमीनी स्तर पर कार्यरत कर्मचारी आर्थिक संकट में होंगे तो योजनाओं की गुणवत्ता और प्रभाव दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
परिवारों पर बढ़ रहा मानसिक दबाव
रोजगार सहायकों का कहना है कि आर्थिक संकट केवल वित्तीय समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, घरेलू जरूरतों को टालना पड़ता है और परिवार के भीतर तनाव बढ़ता है। कई कर्मचारी ऐसे भी हैं जिनके घर में बुजुर्ग माता-पिता या बीमार सदस्य हैं, जिनकी दवाइयों और इलाज का खर्च भी नियमित रूप से उठाना पड़ता है।मानदेय नहीं मिलने के कारण ऐसे परिवार अतिरिक्त दबाव महसूस कर रहे हैं।
काम बंद नहीं करना चाहते, लेकिन मजबूरी बढ़ रही
रोजगार सहायकों ने स्पष्ट किया है कि वे गांवों के विकास कार्यों को बाधित नहीं करना चाहते। उनका उद्देश्य केवल अपनी समस्याओं की ओर प्रशासन का ध्यान आकर्षित करना है।हालांकि उनका कहना है कि यदि लंबे समय तक यही स्थिति बनी रही तो आर्थिक कारणों से कार्य करना कठिन हो जाएगा। निजी संसाधनों से लगातार सरकारी कार्य करना और बिना भुगतान के परिवार चलाना दोनों साथ-साथ संभव नहीं रह जाएगा।
प्रशासन के सामने बड़ा सवाल
रोजगार सहायकों का आवेदन अब प्रशासन के पास पहुंच चुका है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या लंबित मानदेय के भुगतान को लेकर शीघ्र कार्रवाई होगी या फिर कर्मचारियों का इंतजार और लंबा खिंचेगा। ग्रामीण विकास की अधिकांश योजनाएं इन्हीं कर्मचारियों के माध्यम से गांवों तक पहुंचती हैं। ऐसे में यदि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी असर पड़ सकता है।
सबसे बड़ा सवाल
सरकार गांवों को विकसित बनाने की बात कर रही है, लेकिन गांवों के विकास का पहिया घुमाने वाले रोजगार सहायकों के घरों में आर्थिक संकट क्यों गहराता जा रहा है?
जो कर्मचारी तालाब खुदवाने से लेकर आवास दिलाने तक हर योजना को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाते हैं, क्या उन्हें अपनी मेहनत की कमाई के लिए महीनों तक इंतजार करना पड़ेगा?
चार महीने से मानदेय नहीं, बच्चों की फीस बकाया, रसोई उधार के भरोसे और निजी खर्च पर सरकारी काम—क्या यही है जमीनी स्तर पर विकास योजनाओं को लागू करने वालों की हकीकत?
अब निगाहें प्रशासन पर हैं। रोजगार सहायकों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र मानदेय भुगतान नहीं हुआ तो आर्थिक तंगी के कारण वे कार्य करने में असमर्थ हो सकते हैं। सवाल यह है कि क्या उनकी आवाजसुनी जाएगी, या फिर गांवों के विकास का भार उठाने वाले ये कर्मचारी यूं ही अपनी मेहनत की कमाई के लिए दर-दर गुहार लगाते रहेंगे।