11 सितंबर 2025 के बड़े नक्सल एनकाउंटर के बाद बदली तस्वीर, एक करोड़ के इनामी बालकृष्ण समेत 10 नक्सली मारे गए थे; स्वतंत्रता दिवस पर पहली बार सुरक्षा बलों की मौजूदगी में पहाड़ी पर फहराया गया राष्ट्रीय ध्वज,
मैनपुर / गरियाबंद :- आजादी के 80 साल बाद गरियाबंद जिले के मैनपुर क्षेत्र की मटाल पहाड़ी पर पहली बार तिरंगा लहराया गया। जिस पहाड़ी और आसपास के इलाके को कभी नक्सल गतिविधियों के चलते ‘लाल गढ़‘ के नाम से जाना जाता था, वहां स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सुरक्षा बलों ने तिरंगा फहराकर एक नए दौर का संदेश दिया।

मटाल पहाड़ी पर तिरंगा फहराए जाने का यह दृश्य स्थानीय ग्रामीणों के लिए भी खास रहा। वर्षों तक नक्सल गतिविधियों के प्रभाव में रहे इस इलाके के लोगों ने पहली बार अपनी आंखों के सामने पहाड़ी पर राष्ट्रीय ध्वज लहराते देखा। ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ तिरंगा फहराने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस डर के माहौल से बाहर निकलने का प्रतीक भी रहा, जिसने लंबे समय तक इस क्षेत्र के सामान्य जीवन को प्रभावित किया।
यही इलाका था जहां 11 सितंबर 2025 को हुआ था बड़ा एनकाउंटर,
मटाल क्षेत्र का नाम 11 सितंबर 2025 को हुए बड़े नक्सल विरोधी अभियान के बाद भी चर्चा में आया था। मैनपुर के जंगल क्षेत्र में सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ में एक करोड़ रुपए के इनामी नक्सली कमांडर मनोज मोडेम उर्फ बालकृष्ण समेत कुल 10 नक्सली मारे गए थे। अभियान में छत्तीसगढ़ पुलिस, CRPF और कोबरा की टीमें शामिल थीं।
सुरक्षा बलों के अनुसार, मुठभेड़ के बाद मौके से हथियार और नक्सली सामग्री भी बरामद हुई थी। बालकृष्ण नक्सली संगठन का शीर्ष कमांडर बताया गया था।
लाल गढ़’ से तिरंगे की पहचान तक का सफर,
जिस इलाके में कभी लाल झंडे और नक्सली गतिविधियों का दबदबा बताया जाता था, उसी पहाड़ी पर अब तिरंगा लहराया गया। सुरक्षा बलों की मौजूदगी में हुए इस आयोजन ने क्षेत्र में बदलते माहौल की तस्वीर सामने रखी।
ग्रामीणों के लिए यह बदलाव केवल सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं है। तिरंगा फहराए जाने के साथ उन्हें देश के राष्ट्रीय पर्व और राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े उस उत्सव का प्रत्यक्ष अनुभव मिला, जो लंबे समय से उनके लिए दूर की चीज माना जाता था।
ग्रामीणों ने पहली बार देखा आजादी का यह रंग,
मटाल के ग्रामीणों के लिए स्वतंत्रता दिवस का यह आयोजन भावनात्मक भी रहा। पहाड़ी पर तिरंगा लहराते देख लोगों में उत्साह नजर आया। कई ग्रामीणों के लिए यह पहला मौका था जब उन्होंने अपने गांव और आसपास के इलाके में इस तरह खुले तौर पर राष्ट्रीय ध्वज को फहराते देखा।
जिस क्षेत्र में कभी डर और नक्सल गतिविधियों की पहचान हावी थी, वहीं अब तिरंगा शांति, सुरक्षा और मुख्यधारा से जुड़ने की नई पहचान बनता दिखाई दिया।

तिरंगा बना बदलाव का प्रतीक,
मटाल पहाड़ी पर फहराया गया तिरंगा उस बदलाव की तस्वीर है, जिसमें एक समय नक्सल प्रभाव के लिए पहचाने जाने वाले इलाके में अब सुरक्षा बलों और ग्रामीणों की मौजूदगी में राष्ट्रीय पर्व मनाया जा रहा है।
ग्रामीणों के लिए यह दिन इसलिए भी यादगार रहेगा क्योंकि आजादी के 80 साल बाद पहली बार मटाल की पहाड़ी पर तिरंगा लहराया गया। यह दृश्य आने वाले समय में इस क्षेत्र की बदली हुई पहचान और शांति की उम्मीद का प्रतीक बन सकता है।