जाति और न्यायपालिका: सुप्रीम कोर्ट की सोच, संवैधानिक समानता और अधूरा सामाजिक न्याय

SARJU PRASAD SAHU

December 13, 2025

नई दिल्ली।सुप्रीम कोर्ट के रिसर्च एंड प्लानिंग सेंटर (सीआरपी) द्वारा जारी “जाति के बारे में न्यायिक अवधारणा” रिपोर्ट (2025) भारतीय न्यायपालिका के भीतर जाति को लेकर दशकों से चली आ रही वैचारिक खींचतान को उजागर करती है। यह रिपोर्ट दिखाती है कि सर्वोच्च न्यायालय का जाति पर दृष्टिकोण न तो एकरूप रहा है और न ही पूरी तरह संवैधानिक समानता के लक्ष्य के अनुरूप।

रिपोर्ट के विश्लेषण से सामने आता है कि जहां कुछ फैसलों में जाति को शोषण और सत्ता के एक ठोस सामाजिक ढांचे के रूप में पहचाना गया, वहीं कई निर्णयों में जाति को सांस्कृतिक, स्वैच्छिक या ऐतिहासिक रूप से विकृत व्यवस्था बताकर उसकी वास्तविक हिंसक प्रकृति को नजरअंदाज किया गया। यह द्वंद्व न्यायपालिका की उस वैचारिक सीमा को रेखांकित करता है, जहां सामाजिक परिवर्तन की बात तो होती है, लेकिन मूलगामी पुनर्वितरण और संरचनात्मक बदलाव से बचा जाता है।

अंबेडकर के संवैधानिक चेतावनी भरे विचारों, चिन्नप्पा रेड्डी, बी.पी. जीवन रेड्डी और डी.वाई. चंद्रचूड़ जैसे न्यायाधीशों की प्रगतिशील टिप्पणियों के बावजूद, रिपोर्ट यह भी बताती है कि अदालत की भाषा और रूपकों में गहराई से जमी पितृसत्तात्मक और ब्राह्मणवादी सोच आज भी मौजूद है। “घोड़े की दौड़”, “बैसाखी” और “पिछड़े आदिवासी” जैसे रूपक सामाजिक अन्याय को व्यक्तिगत कमजोरी में बदल देते हैं।

लेख में यह भी रेखांकित किया गया है कि जाति को केवल गरीबी से जोड़कर देखने का नजरिया सामाजिक यथार्थ को विकृत करता है। जाति आज भी संसाधनों, अवसरों और सम्मान तक पहुंच तय करती है। शिक्षा और आर्थिक उन्नति मात्र से जातिगत भेदभाव समाप्त नहीं होता, जैसा कि विश्वविद्यालयों और पेशेवर संस्थानों में दलित छात्रों के अनुभव बार-बार साबित करते हैं।

लेखक के अनुसार, न्यायपालिका द्वारा सुझाए गए सुधार—चाहे वे आरक्षण हों, शिक्षा या कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व—तब तक अधूरे रहेंगे जब तक भूमि, उत्पादन के साधनों और सांस्कृतिक वर्चस्व के पुनर्वितरण जैसे मूल सवालों को नहीं छुआ जाता। जाति उन्मूलन के लिए एक व्यापक, राजनीतिक और लोकतांत्रिक संघर्ष अनिवार्य है।

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