रोशनी के दूत स्वयं अंधेरे में: देवभोग में बाबा साहेब अंबेडकर की प्रतिमा 10 वर्षों से उपेक्षित

SARJU SAHU

August 20, 2026

प्रतिमा स्थल पर शाम होते ही छा जाता है अंधेरा, नगर पंचायत बनने के बाद भी नहीं बदली तस्वीर

देवभोग। देश के संविधान निर्माता भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा दशकों से प्रतिष्ठा और आदर की निशानी है, लेकिन देवभोग मुख्यालय में यह महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल आज उपेक्षा और अंधेरे की चपेट में है। स्थानीय निवासियों और सामाजिक संगठनों के अनुसार प्रतिमा स्थल पर समुचित प्रकाश व्यवस्था नहीं होने से शाम होते ही वहां अंधेरा छा जाता है। यह स्थिति करीब 10 वर्षों से बनी हुई है और नगर पंचायत बनने के डेढ़ साल बाद भी जस की तस बनी हुई है, जिसका लोग विरोध कर रहे हैं। 

स्थानीय लोगों ने बताया कि प्रतिमा स्थल पर प्रकाश व्यवस्था की कमी कोई नई समस्या नहीं है। पिछले एक दशक से नागरिक तथा सामाजिक संगठन बार-बार इस मुद्दे को उठाते रहे हैं, लेकिन न तो ग्राम पंचायत के दौरान और न ही नगर पंचायत बनने के बाद प्रशासन ने इस ओर पर्याप्त ध्यान दिया। इससे प्रतिमा परिसर की गरिमा प्रभावित होने के साथ ही वहां आने वाले लोगों की असंतुष्टि और निराशा बढ़ी है। 

स्थानीय निवासी इस बात पर नाराज़ और निराश हैं कि जिस महापुरुष ने समाज और देश को समानता, न्याय और शिक्षा का संदेश दिया, उसकी प्रतिमा रात होते ही अंधेरे में छिप जाती है। एक स्थानीय नागरिक ने कहा, “शहर की पहचान केवल सड़क और भवनों से नहीं, बल्कि वहां स्थापित महापुर्यों के प्रति सम्मान से भी होती है। प्रतिमा की रोशनी नहीं होना प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा करता है।” सामाजिक संगठन भी इस मामले में आवाज उठा रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि प्रतिमा परिसर की रोशनी, साफ-सफाई और सौंदर्यीकरण तुरंत सुनिश्चित किया जाए।

देवभोग के नगर पंचायत बनने के बाद नागरिकों को उम्मीद थी कि अब स्थानीय स्तर पर विकास की योजनाओं के जरिए ऐसे सार्वजनिक स्थलों का कायाकल्प होगा। विशेष रूप से डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा जैसे स्थानों का सौंदर्यीकरण और रोशनी का प्रबंध अपेक्षित था। परंतु नगर पंचायत के डेढ़ साल में भी इस स्थल की दशा में कोई विशेष बदलाव नहीं दिखाई दिया, जिससे लोगों की उम्मीदें कहीं धंसती दिख रही हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि विकास योजनाओं और बजट में प्राथमिकताओं के कारण ऐसे संवेदनशील सार्वजनिक स्थलों को अक्सर अनदेखा किया जाता है। इसके पीछे प्रशासनिक लापरवाही, स्रोतों की कमी और स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा आवश्यक अग्रीमता न देना मुख्य कारण हैं। वहीं नागरिकों का कहना है कि थोड़ी सी पहल — पर्याप्त बिजली पोल, सौर लाइटिंग, नियमित सफाई और पौधरोपण — इस स्थल को गरिमापूर्ण बना सकती है और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत भी बना सकती है। 

स्थानीय स्तर पर कई बार नगर पंचायत और संबंधित अधिकारियों को समस्या की ओर सूचित किया गया है, परंतु ठोस कार्रवाई का अभाव बना रहा। कुछ नागरिकों ने यह भी बताया कि बिजली कनेक्शन और ऊर्जा आपूर्ति जैसी तकनीकी बाधाएं भी समस्या का हिस्सा हैं, पर प्राथमिकता न देने के कारण समाधान लंबित है। नगर पंचायत के अधिकारियों से टिप्पणी का प्रयास करने पर उन्होंने कहा कि बजट और तकनीकी योजना बन रही है, परंतु अभी तक कोई निश्चित कार्यवाही प्रारंभ नहीं हुई है। 

निवासियों का तर्क है कि प्रतिमा स्थल को रोशन करना मात्र बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता नहीं, बल्कि संविधान निर्माता के प्रति सम्मान और समाज की संवेदनशीलता का प्रतीक है। रोशनी की कमी न केवल प्रतिमा की भौतिक उपेक्षाकृत दर्शाती है, बल्कि यह उस जागरूकता की भी कमी को दर्शाती है जो समाज को नैतिक और संवैधानिक मूल्यों के प्रति बनाए रखती है।

मामले की मांगें और संभावित समाधान

▪️स्थानीय सामाजिक संगठन और नागरिक मांग कर रहे हैं:

▪️प्रतिमा परिसर में तत्काल और पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था (सौर आधारित लाइटिंग शामिल)।

▪️नियमित सफाई और रख-रखाव का शेड्यूल।

▪️सौंदर्यीकरण के लिए पौधरोपण, पथ-प्रकाश और बैठने की व्यवस्था।

▪️नगर पंचायत द्वारा इस स्थल को विकास प्राथमिकता में शामिल करना।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि सोलर स्ट्रीट लाइट्स लगाने, स्थानीय स्वयंसेवक एवं एनजीओ के सहयोग से रख-रखाव सुनिश्चित करने और छोटे-छोटे बजट प्रोजेक्ट के जरिए शीघ्र परिणाम मिल सकते हैं। इससे लागत कम और प्रभाव शीघ्र दिखाई दे सकता है।

करीब 10 वर्षों से देवभोग मुख्यालय में खड़ी डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा पर अंधेरा इसका दुखद प्रतीक बन गया है। नगर पंचायत बनने के बाद भी जब तक प्रशासन और स्थानीय प्रतिनिधि इस स्थल को प्राथमिकता नहीं देंगे, यह हालात जस के तस बने रहेंगे। नागरिक एवं सामाजिक संगठनों की मांग है कि प्रशासन शीघ्र और ठोस कदम उठाकर प्रतिमा परिसर को सम्मान की रोशनी में लाए, ताकि यह स्थान सिर्फ अतीत की स्मृति न रहकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का केंद्र बन सके।

संपादक { विज्ञापन‍ }

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