जनपद पंचायत पलारी के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत मुसुवाडीह एक बार फिर गंभीर आरोपों के कारण सुर्खियों में है। गांव के पंचों, ग्रामीणों और पूर्व जनप्रतिनिधियों ने सरपंच अंजली सारथी तथा पंचायत सचिव विजय चेलक पर भ्रष्टाचार, फर्जी भुगतान, सरकारी राशि के गबन और योजनाओं में अवैध वसूली जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए मुख्य कार्यपालन अधिकारी को शिकायत सौंपी है।
लेकिन सवाल केवल पंचायत तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतने गंभीर आरोपों के बावजूद प्रशासन अब तक मौन क्यों है? क्या पंचायतों में भ्रष्टाचार रोकने की जिम्मेदारी सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है? क्या जनपद और जिला स्तर पर होने वाली मॉनिटरिंग केवल फाइलों में चल रही है? मुसुवाडीह का मामला अब केवल एक पंचायत का विवाद नहीं, बल्कि पूरे पंचायत तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है।
ग्रामीणों द्वारा 19 मई 2026 को सौंपे गए शिकायत पत्र में कहा गया है कि पंचायत में विकास कार्यों के नाम पर सरकारी योजनाओं की राशि का खुला दुरुपयोग किया गया। आरोप है कि 15वें वित्त आयोग और मूलभूत मद की लगभग 5 लाख 12 हजार 900 रुपए की राशि निकाल ली गई, लेकिन गांव में धरातल पर कोई बड़ा विकास कार्य दिखाई नहीं देता। यदि यह आरोप सही हैं तो सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि राशि जारी होने के बाद तकनीकी परीक्षण, माप पुस्तिका और निरीक्षण प्रक्रिया कहां थी?
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत बनने वाले शौचालयों में हितग्राहियों और पंचों से 2-2 हजार रुपए तक वसूले गए। सरकार जहां ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच मुक्त अभियान को जनआंदोलन बताती है, वहीं मुसुवाडीह जैसे मामलों से सवाल उठता है कि क्या गरीबों के नाम पर चल रही योजनाएं भ्रष्टाचार का जरिया बन चुकी हैं?
प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि हितग्राहियों से राशि मांगने के साथ-साथ एक हितग्राही दरोगा निषाद से “बकरा” मांगने तक की बात कही गई। यदि यह आरोप सत्य हैं तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं बल्कि गरीबों के सम्मान के साथ खिलवाड़ है। सवाल यह भी है कि पंचायत स्तर पर हितग्राही चयन और भुगतान की प्रक्रिया की निगरानी कौन कर रहा था?
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि पंचायत में सवाल पूछना ही अपराध बन गया है। पंचों का कहना है कि जब वे पंचायत के आय-व्यय का हिसाब मांगते हैं तो उन्हें बैठक से बाहर कर दिया जाता है। विरोध करने पर झूठे मामलों में फंसाने और गाली-गलौज करने की धमकी दी जाती है। लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई कही जाने वाली पंचायत यदि भय और दबाव का केंद्र बन जाए, तो यह पूरे प्रशासनिक ढांचे के लिए चिंता का विषय है।
शिकायत में पंचायत खाते से हुई कई संदिग्ध निकासी का भी उल्लेख किया गया है। आरोप है कि सचिव की पत्नी के नाम पर 15 हजार और 16 हजार रुपए निकाले गए। उपसरपंच के पति डिगेंद्र मारकण्डे के नाम पर अलग-अलग तिथियों में 60 हजार 400 रुपए निकाले जाने का आरोप लगाया गया है। इसके अलावा रविंद्र ट्रेडर्स, भरत किराना, वर्मा इलेक्ट्रिकल, अशोक वर्मा और वर्मा चौपाटी के नाम पर भी हजारों रुपए के भुगतान पर सवाल उठाए गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई भुगतान बिना कार्य कराए किए गए।
घसिया भाठा रोड का मामला भी चर्चा में है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि केवल दो ट्रिप मुरूम डालकर 42 हजार रुपए की राशि निकाल ली गई। गांव के लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन मौके पर जाकर निरीक्षण करे तो कई कथित कार्य केवल कागजों में ही मिलेंगे।
सबसे गंभीर आरोप सरपंच के जाति प्रमाण पत्र को लेकर लगाया गया है। शिकायत में कहा गया है कि पूर्व में पिछड़ा वर्ग से पंच का चुनाव लड़ने वाली अंजली सारथी ने वर्ष 2025 के पंचायत चुनाव में अनुसूचित जाति वर्ग से चुनाव लड़कर सरपंच पद हासिल किया। यदि इस मामले में दस्तावेजों की जांच होती है और आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल चुनावी अनियमितता नहीं बल्कि शासन और प्रशासन को गुमराह करने का मामला बन सकता है।
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा सवाल प्रशासनिक निगरानी पर उठ रहे हैं। पंचायतों में हर भुगतान ऑनलाइन प्रक्रिया, तकनीकी स्वीकृति और रिकॉर्ड के आधार पर होता है। ऐसे में यदि लाखों रुपए की कथित गड़बड़ी हुई तो जिम्मेदार अधिकारी अब तक कार्रवाई से दूर क्यों हैं? क्या पंचायतों की ऑडिट व्यवस्था केवल औपचारिकता बनकर रह गई है?
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई, जिससे पंचायत प्रतिनिधियों के हौसले और बढ़ गए। यही वजह है कि अब ग्रामीण खुलकर सामने आ रहे हैं और जनपद पंचायत से लेकर जिला प्रशासन तक निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।
शिकायतकर्ताओं में पूर्व सरपंच आशीष वर्मा, पंच पूर्णिमा ध्रुव, राजकुमार ध्रुव, यशु टिकरिहा, यशवंत टंडन सहित कई ग्रामीण शामिल रहे। सभी ने मांग की है कि पंचायत के वित्तीय रिकॉर्ड, बैंक खाते और निर्माण कार्यों की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।
मुसुवाडीह का मामला अब केवल एक गांव की शिकायत नहीं रह गया है। यह उस पंचायत व्यवस्था पर सवाल है, जिसे गांवों के विकास की रीढ़ माना जाता है। यदि पंचायतों में पारदर्शिता नहीं होगी, योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचेगा और शिकायत करने वालों को धमकियां मिलेंगी, तो शासन के “गांव विकास” के दावे केवल भाषणों तक सीमित रह जाएंगे।
अब देखने वाली बात यह होगी कि जनपद पंचायत पलारी और जिला प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई करता है या फिर यह शिकायत भी अन्य फाइलों की तरह दफ्तरों में दबकर रह जाएगी।