समग्र ब्राह्मण परिषद् का बड़ा आयोजन, 71 बटुकों ने धारण किया जनेऊ

SARJU PRASAD SAHU

May 3, 2026

रायपुर। समग्र ब्राह्मण परिषद् छत्तीसगढ़ द्वारा रविवार 3 मई को श्री महामाया देवी मंदिर के सत्संग भवन में प्रदेश स्तरीय सामूहिक उपनयन संस्कार का भव्य आयोजन किया गया। इस अवसर पर 71 ब्राह्मण बटुकों ने शास्त्रोक्त विधि-विधान के साथ जनेऊ धारण कर ‘द्विज’ के रूप में अपने जीवन के नए चरण में प्रवेश किया।

कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चार एवं मंगलाचरण के साथ हुई, जिससे वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक और भक्तिमय हो गया। मुख्य सलाहकार एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. भावेश शुक्ला “पराशर” ने बताया कि आचार्यों के मार्गदर्शन में चुलमाटी, मंडपाच्छादन, देवतला, चिकट, मातृका पूजन जैसी पारंपरिक विधियों के बाद बटुकों का मुंडन, स्नान एवं शुद्धिकरण कराया गया। तत्पश्चात देव पूजन, मातृ-पितृ वंदन और आचार्य वरण के साथ यज्ञोपवीत धारण कराया गया।

संस्कार के दौरान बटुकों को गायत्री मंत्र की दीक्षा दी गई तथा संध्या-वंदन, अनुशासन और ब्रह्मचर्य के महत्व से अवगत कराया गया। यज्ञोपवीत धारण के बाद बटुकों ने “भवति भिक्षाम देहि” कहकर पारंपरिक भिक्षा ग्रहण की रस्म भी निभाई। आयोजन के अंत में सभी बटुकों को पीले कुर्ता-पायजामा में सुसज्जित कर गाजे-बाजे और आतिशबाजी के साथ नगर भ्रमण कराया गया।

प्रदेश सचिव पं. सजल तिवारी एवं पं. श्रीकांत तिवारी ने बताया कि उपनयन संस्कार सनातन धर्म के सोलह संस्कारों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। जनेऊ धारण करने के साथ ही बालक ‘द्विज’ बनता है, जो उसे ज्ञान, कर्तव्य और नैतिक जीवन की ओर प्रेरित करता है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी अपनी संस्कृति और मूल्यों से जुड़ी रहती है।

प्रदेशाध्यक्ष पं. रामानुज तिवारी एवं प्रदेश मीडिया प्रभारी पं. उमाकांत तिवारी ने बताया कि यह सामूहिक उपनयन संस्कार का पांचवां वर्ष है। इसका उद्देश्य समाज में एकता और समरसता को बढ़ावा देना तथा उन परिवारों की सहायता करना है जो व्यक्तिगत रूप से इस संस्कार का आयोजन करने में सक्षम नहीं होते।

कार्यक्रम में आचार्य सुनील कृष्ण शर्मा के मार्गदर्शन में पंडितों की टीम ने पूरे विधि-विधान से संस्कार संपन्न कराया। आयोजन को सफल बनाने में परिषद् पदाधिकारियों, सामाजिक सहयोगियों एवं बड़ी संख्या में उपस्थित अभिभावकों का विशेष योगदान रहा।

अभिभावकों ने परिषद् के इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन बच्चों के व्यक्तित्व विकास, अनुशासन और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पारंपरिक वेशभूषा में सजे बटुकों का उत्साह आयोजन की गरिमा को और बढ़ाता नजर आया।

संपादक { विज्ञापन‍ }

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