पलारी। क्षेत्र में लगातार बढ़ रही शराब दुकानों को लेकर अब विरोध के स्वर तेज होने लगे हैं। हर 10 से 15 किलोमीटर के दायरे में नई दुकानों के खुलने से ग्रामीणों में नाराज़गी साफ नजर आ रही है। पलारी, गिधपुरी, रोहांसी और संडी सहित आसपास के गांवों के लोगों का कहना है कि यह स्थिति केवल व्यापारिक विस्तार नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन बिगाड़ने वाली है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि एक तरफ सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास की बात करती है, वहीं दूसरी ओर शराब दुकानों की संख्या में तेजी से इजाफा कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। हाल ही में विभिन्न इलाकों में नए ठेके खुलने से गांव-गांव तक शराब की पहुंच आसान हो गई है।
युवाओं पर असर, पढ़ाई से भटकाव की आशंका
ग्रामीणों और अभिभावकों की मानें तो इसका सबसे ज्यादा असर युवाओं और छात्रों पर पड़ रहा है। स्कूल और कॉलेज जाने वाले बच्चों का ध्यान पढ़ाई से भटकने लगा है। अभिभावकों का कहना है कि शराब की आसान उपलब्धता के कारण गलत संगत और नशे की प्रवृत्ति बढ़ने का खतरा पहले से ज्यादा हो गया है। शिक्षकों ने भी छात्रों की एकाग्रता और अनुशासन में गिरावट की बात कही है।
इस पूरे मामले में गरीब और श्रमिक वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित नजर आ रहा है। सीमित आय वाले परिवारों में जहां हर खर्च सोच-समझकर किया जाता है, वहीं शराब पर बढ़ता खर्च घरेलू बजट बिगाड़ रहा है। कई परिवारों में रोजमर्रा की जरूरतों—राशन, शिक्षा और इलाज—पर असर पड़ने लगा है।
महिलाओं ने चिंता जताते हुए कहा कि पुरुषों की कमाई का बड़ा हिस्सा नशे में खर्च हो रहा है, जिससे घरेलू कलह और आर्थिक संकट गहराता जा रहा है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और कई मामलों में परिवारों की स्थिति कमजोर होती जा रही है।
सामाजिक माहौल पर पड़ रहा असर
ग्रामीणों का कहना है कि शराब दुकानों की संख्या बढ़ने से गांवों का सामाजिक वातावरण भी प्रभावित हुआ है। झगड़े, विवाद और असामाजिक गतिविधियों की शिकायतें बढ़ी हैं। लोगों का मानना है कि यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह कानून-व्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकता है।
राजस्व बनाम सामाजिक जिम्मेदारी पर बहस
शराब बिक्री से मिलने वाले राजस्व को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि राजस्व बढ़ाने के लिए समाज के कमजोर वर्ग और युवाओं के भविष्य को दांव पर लगाया जा रहा है, तो यह संतुलित विकास नहीं कहा जा सकता। विकास केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें सामाजिक और नैतिक पहलू भी शामिल होने चाहिए।
प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि शराब दुकानों की संख्या पर नियंत्रण किया जाए और उनके स्थान का चयन सावधानीपूर्वक किया जाए। स्कूलों, कॉलेजों और आवासीय क्षेत्रों के पास दुकानों को खोलने पर रोक लगाने की भी मांग उठी है। साथ ही, नशा मुक्ति अभियान को प्रभावी बनाने और युवाओं के लिए सकारात्मक अवसर बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
आगे क्या ?
पलारी क्षेत्र में बढ़ती शराब दुकानों का मुद्दा अब केवल स्थानीय असंतोष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़े सामाजिक सवाल के रूप में उभर रहा है। आने वाले समय में प्रशासन इस पर क्या कदम उठाता है, इस पर क्षेत्र की सामाजिक स्थिति काफी हद तक निर्भर करेगी। फिलहाल ग्रामीणों की निगाहें जिम्मेदार तंत्र की ओर टिकी हुई हैं।