
रिपोर्टर टेकराम कोसले
-बेमेतरा। जिले के कई कृषि केंद्रों और ग्रामीण अंचलों में किसानों को निर्धारित मूल्य से अधिक दर पर यूरिया खाद खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। खरीफ फसल के बाद रबी फसल की तैयारी में जुटे किसानों को खाद की भारी आवश्यकता होती है, लेकिन सरकारी समितियों में खाद की अनुपलब्धता के चलते उन्हें खुले बाजार से महंगे दामों पर खाद खरीदनी पड़ रही है। स्थिति यह है कि जिले के तीनों नगरों और तहसील क्षेत्रों में यूरिया खाद 500 से 600 रुपये प्रति बोरी तक बेची जा रही है, जो निर्धारित दर से लगभग दोगुनी है।
अवैध गोदामों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
ग्रामीण क्षेत्रों में अवैध गोदामों में खाद का भंडारण और कालाबाजारी खुलेआम हो रही है, लेकिन कृषि विभाग के जिम्मेदार अधिकारी इन पर प्रभावी कार्रवाई करने में विफल नजर आ रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि आखिर कृषि विभाग इन अवैध गतिविधियों पर लगाम क्यों नहीं लगा पा रहा है? क्या अधिकारी दबाव में हैं या फिर जानबूझकर आंख मूंदे हुए हैं?
नकली व अमानक कीटनाशकों की बिक्री भी जोरों पर
सिर्फ यूरिया ही नहीं, बल्कि जिले में नकली और अमानक कीटनाशक दवाओं की बिक्री भी तेजी से बढ़ रही है। किसानों को कम गुणवत्ता की दवाएं महंगे दामों पर बेची जा रही हैं, जिससे उनकी फसलों को नुकसान होने की आशंका बढ़ गई है। बावजूद इसके, जिम्मेदार विभाग द्वारा नियमित जांच और ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही, जिससे किसानों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
सरकारी समितियों में खाद की कमी, किसान दर-दर भटकने को मजबूर
कई सरकारी सहकारी समितियों में खाद की उपलब्धता नहीं होने के कारण किसान मजबूरी में निजी दुकानों से खाद खरीद रहे हैं। वहां उन्हें ऊंची कीमत चुकानी पड़ रही है। किसान नेताओं का कहना है कि यदि समय पर समितियों में खाद उपलब्ध कराई जाए और अवैध बिक्री पर सख्ती से कार्रवाई हो, तो किसानों को राहत मिल सकती है।
किसानों की मांग: तत्काल जांच और सख्त कार्रवाई
किसानों और ग्रामीण संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि जिले में खाद और कीटनाशकों की बिक्री की व्यापक जांच कराई जाए। ओवर रेट पर खाद बेचने वालों, नकली और अमानक दवाओं की आपूर्ति करने वालों तथा अवैध गोदाम संचालकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि किसानों को न्याय मिल सके और कृषि व्यवस्था पर से भरोसा बना रहे।
निष्कर्ष: जिले में यूरिया की कालाबाजारी और नकली कीटनाशकों की बिक्री किसानों के लिए गंभीर समस्या बन चुकी है। यदि समय रहते कृषि विभाग और प्रशासन द्वारा प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो इसका सीधा असर आगामी फसलों और किसानों की आर्थिक स्थिति पर पड़ेगा।