
रिपोर्टर टेकराम कोसले
छत्तीसगढ़। आदिम जाति विकास विभाग का नाम बदलकर ‘जनजातीय कार्य विभाग’ किए जाने के निर्णय को लेकर आदिवासी समाज में आपत्ति सामने आई है। समाचार पत्रों एवं सोशल मीडिया से प्राप्त जानकारी के अनुसार, 11 अक्टूबर 2026 को आयोजित मंत्रिपरिषद की बैठक में विभाग का नाम बदलने का निर्णय लिया गया है। इस संबंध में आदिवासी समाज ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए छत्तीसगढ़ शासन से निर्णय पर पुनर्विचार करने और विभाग का नाम ‘आदिम जाति विकास विभाग’ यथावत रखने की मांग की है।
समाज का कहना है कि किसी विभाग का नाम केवल प्रशासनिक पहचान तक सीमित नहीं होता, बल्कि उससे जुड़ा इतिहास, संस्कृति, सामाजिक पहचान और जनभावनाएं भी महत्वपूर्ण होती हैं। ऐसे में विभाग के नाम में प्रस्तावित परिवर्तन को आदिवासी समाज की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा जा रहा है।
‘आदिम जाति’ शब्द आदिवासी समाज की पहचान से जुड़ा विषय
आदिवासी समाज का मानना है कि ‘आदिम जाति’ शब्दावली केवल एक नाम नहीं, बल्कि समाज के इतिहास, परंपराओं और भावनात्मक जुड़ाव का हिस्सा है। पीढ़ियों से आदिवासी समुदाय अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक जीवनशैली और सामाजिक मूल्यों को संरक्षित करता आया है।
समाज के विभिन्न वर्गों के लिए पहचान से जुड़े शब्दों का विशेष महत्व होता है। इसलिए विभाग का नाम बदलने से पहले संबंधित समुदाय की भावनाओं, विचारों और अपेक्षाओं पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
जल, जंगल और जमीन से जुड़ा है आदिवासी समाज का संघर्ष
आदिवासी समाज का इतिहास जल, जंगल और जमीन के संरक्षण तथा अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के संघर्ष से जुड़ा रहा है। अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामुदायिक पहचान को बनाए रखना समाज की प्रमुख चिंताओं में शामिल है।
ऐसे में विभाग के नाम में बदलाव का मुद्दा केवल प्रशासनिक निर्णय का विषय नहीं है, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता, सांस्कृतिक विरासत और जनभावनाओं से भी संबंधित है। समाज की मांग है कि शासन किसी भी प्रकार का अंतिम निर्णय लेते समय इन पहलुओं को उचित महत्व दे।
छत्तीसगढ़ शासन से पुनर्विचार करने की अपील
आदिवासी समाज की ओर से छत्तीसगढ़ शासन से आग्रह किया गया है कि आदिम जाति विकास विभाग का नाम बदलने के निर्णय पर गंभीरतापूर्वक पुनर्विचार किया जाए। समाज का कहना है कि विभाग के वर्तमान नाम को यथावत रखा जाना चाहिए, ताकि ऐतिहासिक पहचान और उससे जुड़ी जनभावनाओं का सम्मान बना रहे।
इस विषय पर शासन द्वारा संबंधित समुदाय के प्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों के विचारों को सुनने की पहल भी संवाद की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।
आदिवासी अस्मिता और जनभावनाओं के सम्मान की मांग
समाज की मांग है कि विकास एवं प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े निर्णय लेते समय संबंधित समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और भावनात्मक जुड़ाव को भी ध्यान में रखा जाए। विभाग का नाम यथावत रखने की यह अपील आदिवासी समाज की पहचान और परंपराओं के सम्मान से जुड़ी मांग के रूप में सामने आई है।
आदिवासी समाज की ओर से शासन से अपेक्षा की गई है कि वह इस विषय पर संवेदनशीलता के साथ विचार करे और विभाग का नाम ‘आदिम जाति विकास विभाग’ ही बनाए रखने के संबंध में उचित निर्णय ले।
एक तीर, एक कमान।
जय भीम!
रवि रविन्द्र