वकालत को सुरक्षित पेशा ही नहीं, सुरक्षित जीवन भी चाहिए — अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी

TEJASWI NATH SONI

September 19, 2026

छत्तीसगढ़ में अधिवक्ता संरक्षण की नई परिकल्पना: सुरक्षा, शुरुआती संघर्ष, बीमारी, वृद्धावस्था और न्यायालयीन कार्यस्थल—पांचों मोर्चों पर समग्र व्यवस्था की जरूरत

रायपुर। न्यायालय में जब कोई अधिवक्ता अपने मुवक्किल की ओर से तर्क रखता है, तब सामने उसका केवल पेशेवर पक्ष दिखाई देता है। इसके पीछे एक ऐसा जीवन भी है, जिसमें रोज की तैयारी, निरंतर अध्ययन, न्यायालयीन भागदौड़, मुवक्किलों की जिम्मेदारी और कई बार अनिश्चित आय के बीच पेशे को बनाए रखने की चुनौती शामिल होती है।

इसी व्यापक वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ में अधिवक्ता प्रोटेक्शन एक्ट की मांग को केवल सुरक्षा के प्रश्न तक सीमित रखने के बजाय अधिवक्ता के पूरे पेशेवर जीवन-चक्र से जोड़कर देखने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।

अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर एवं सेशन कोर्ट, रायपुर के अनुसार अधिवक्ता संरक्षण की चर्चा को केवल किसी अप्रिय घटना के बाद कार्रवाई तक सीमित न रखकर ऐसी समग्र व्यवस्था के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें अधिवक्ता को निर्भय होकर काम करने का वातावरण मिले।

कार्यस्थल पर सुरक्षा पहला सवाल

अधिवक्ता का चेंबर या कार्यालय उसके पेशे का महत्वपूर्ण कार्यस्थल है। यहां मुवक्किलों से चर्चा, दस्तावेजों का अध्ययन और कानूनी रणनीति तैयार की जाती है।

यदि किसी अधिवक्ता के कार्यालय या चेंबर में मारपीट, धमकी, गाली-गलौज, जबरदस्ती अथवा पेशेवर कार्य में गंभीर हस्तक्षेप की घटना होती है, तो ऐसी परिस्थितियों के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान होने चाहिए।

गंभीर घटनाओं में अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों के अनुरूप गैर-जमानती प्रावधानों पर विधायी स्तर पर विचार किया जा सकता है। साथ ही वास्तविक घटनाओं और दुर्भावनापूर्ण या झूठी शिकायतों के बीच अंतर करने के लिए उचित कानूनी प्रक्रिया भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

युवा अधिवक्ताओं के शुरुआती संघर्ष पर ध्यान जरूरी

कानून की डिग्री और अधिवक्ता के रूप में पंजीयन के बाद वास्तविक पेशेवर प्रशिक्षण का एक महत्वपूर्ण चरण शुरू होता है। शुरुआती वर्षों में युवा अधिवक्ता को न्यायालयीन प्रक्रिया, आवेदन प्रस्तुत करने, केस डायरी समझने, साक्ष्य के परीक्षण और जिरह की तैयारी जैसी व्यावहारिक बारीकियां सीखनी पड़ती हैं।

इस अवधि में आय सीमित अथवा अनिश्चित हो सकती है। इसलिए तीन वर्ष से कम अवधि से पंजीकृत नए अधिवक्ताओं के लिए निर्धारित पात्रता और प्रशिक्षण गतिविधियों से जुड़ी प्रारंभिक पेशेवर प्रशिक्षण एवं इंटर्नशिप छात्रवृत्ति शुरू करने के प्रस्ताव पर विचार किया जा सकता है।

इसका उद्देश्य मुफ्त आय उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि शुरुआती दौर में युवा अधिवक्ता को पेशेवर क्षमता विकसित करने का अवसर देना होना चाहिए।

65 वर्ष के बाद सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न

वकालत ऐसा पेशा है जिसमें सामान्य रूप से कोई निर्धारित सेवानिवृत्ति आयु नहीं होती। कई अधिवक्ता लंबे समय तक सक्रिय रहते हैं। हालांकि उम्र बढ़ने के साथ आय के स्रोत सीमित हो सकते हैं और चिकित्सा संबंधी खर्च बढ़ सकता है।

इसलिए 65 वर्ष से अधिक आयु के पात्र अधिवक्ताओं के लिए निर्धारित पात्रता, न्यूनतम वकालत अवधि और आय संबंधी मानदंडों के आधार पर मासिक पेंशन अथवा जीवन-निर्वाह सहायता की योजना पर विचार किया जा सकता है।

बीमारी में उपचार के साथ आय की चिंता भी

गंभीर बीमारी की स्थिति में अधिवक्ता के सामने केवल उपचार का खर्च ही नहीं, बल्कि काम न कर पाने के कारण आय में कमी की समस्या भी उत्पन्न हो सकती है।

अधिवक्ता कल्याण योजना में अधिवक्ता और उसके पात्र आश्रित परिवार के लिए कम से कम 20 लाख रुपये तक की कैशलेस स्वास्थ्य उपचार सुविधा उपलब्ध कराने की मांग पर विचार किया जा सकता है।

इसके साथ ही गंभीर बीमारी अथवा चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित अस्थायी कार्य-असमर्थता की स्थिति में निर्धारित अवधि के लिए जीवन-निर्वाह सहायता का प्रावधान भी किया जा सकता है।

न्यायालय भी अधिवक्ता का कार्यस्थल

यदि न्यायालय परिसर अधिवक्ता के नियमित कार्यस्थल का हिस्सा है, तो न्यायालयीन बुनियादी ढांचे की योजना बनाते समय अधिवक्ताओं की व्यावहारिक जरूरतों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

आवश्यकतानुसार न्यायालयों में—

पर्याप्त बार रूम और बैठने की व्यवस्था

स्वच्छ पेयजल

शौचालय

इंटरनेट सुविधा

ई-फाइलिंग सुविधा

दस्तावेज स्कैनिंग

प्रिंटिंग सुविधा

उपलब्ध कराए जाने की आवश्यकता पर विचार किया जा सकता है।

चेंबर केवल सुविधा नहीं, कानूनी गोपनीयता का स्थान

अधिवक्ता और मुवक्किल के बीच होने वाली बातचीत कई मामलों में संवेदनशील होती है। इसलिए न्यायालय परिसर में उपलब्ध स्थान के अनुसार अलग चेंबर अथवा प्राइवेट कंसल्टेशन केबिन विकसित किए जाने चाहिए।

चेंबर आवंटन की प्रक्रिया पारदर्शी हो तथा नए और पुराने अधिवक्ताओं के लिए न्यायसंगत व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

महिला अधिवक्ताओं के लिए परिवार-अनुकूल कार्यस्थल

न्याय व्यवस्था में महिला अधिवक्ताओं की भागीदारी को ध्यान में रखते हुए न्यायालय परिसरों में उनकी व्यावहारिक जरूरतों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

स्वच्छ महिला शौचालय, सुरक्षित विश्राम स्थल, मातृत्व संबंधी आवश्यक सुविधाएं तथा बड़े न्यायालय परिसरों में आवश्यकता के अनुसार क्रेच/चाइल्ड-केयर सुविधा विकसित करने पर विचार किया जा सकता है।

अधिवक्ता की मृत्यु का प्रभाव परिवार पर

किसी अधिवक्ता की आकस्मिक मृत्यु के बाद उसके परिवार के सामने आर्थिक संकट उत्पन्न हो सकता है। इसलिए अधिवक्ता कल्याण व्यवस्था में पात्र अधिवक्ता की मृत्यु पर आश्रित परिवार को आर्थिक सहायता, बच्चों की शिक्षा के लिए सहायता तथा उपलब्ध स्वास्थ्य योजना की निरंतरता जैसे प्रावधानों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

डिजिटल युग में तकनीकी सहायता भी जरूरी

ई-फाइलिंग और डिजिटल न्याय व्यवस्था ने अधिवक्ताओं के काम करने के तरीके में बदलाव किया है। जिला और तहसील स्तर तक डिजिटल सेवाओं का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय परिसरों में अधिवक्ता डिजिटल सहायता केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं।

इन केंद्रों पर ई-फाइलिंग, स्कैनिंग, प्रिंटिंग और ऑनलाइन न्यायालयीन सेवाओं से संबंधित तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है।

अधिवक्ता जीवन-चक्र कल्याण मॉडल

अधिवक्ता संरक्षण कानून को अलग-अलग योजनाओं का संग्रह बनाने के बजाय “अधिवक्ता जीवन-चक्र कल्याण मॉडल” के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया गया है।

इस मॉडल में अधिवक्ता के पेशेवर जीवन के पांच प्रमुख चरणों को शामिल किया जा सकता है—

प्रवेश: नए अधिवक्ता के लिए प्रशिक्षण एवं छात्रवृत्ति।

स्थापना: कार्यस्थल, चेंबर और डिजिटल सुविधाएं।

सुरक्षा: हिंसा, धमकी और पेशेवर कार्य में अनुचित हस्तक्षेप से कानूनी संरक्षण।

संकट: बीमारी, दुर्घटना और अस्थायी कार्य-असमर्थता में सहायता।

वृद्धावस्था: 65 वर्ष के बाद पात्र अधिवक्ताओं के लिए पेंशन अथवा जीवन-निर्वाह सहायता।

प्रस्तावित प्रमुख मांगें

अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी द्वारा रखे गए प्रमुख सुझावों में शामिल हैं—

• अधिवक्ता के चेंबर, कार्यालय अथवा न्यायालय परिसर में मारपीट, धमकी, गाली-गलौज एवं पेशेवर कार्य में जबरन हस्तक्षेप के लिए विशेष कानूनी प्रावधान।

• गंभीर प्रकृति की घटनाओं में परिस्थितियों के अनुरूप गैर-जमानती प्रावधानों पर विधायी विचार।

• तीन वर्ष से कम अवधि से पंजीकृत नए अधिवक्ताओं के लिए इंटर्नशिप/प्रशिक्षण छात्रवृत्ति।

• 65 वर्ष से अधिक आयु के पात्र अधिवक्ताओं के लिए मासिक पेंशन अथवा जीवन-निर्वाह सहायता।

• अधिवक्ता एवं आश्रित परिवार के लिए कम से कम 20 लाख रुपये तक कैशलेस चिकित्सा सुविधा।

• गंभीर बीमारी अथवा प्रमाणित कार्य-असमर्थता के दौरान निर्धारित अवधि के लिए जीवन-निर्वाह सहायता।

• आकस्मिक मृत्यु की स्थिति में पात्र अधिवक्ता के परिवार के लिए आर्थिक सहायता।

• न्यायालयों में पर्याप्त बैठने की व्यवस्था और बार रूम।

• चेंबर/केबिन तथा मुवक्किल से कानूनी परामर्श के लिए निजी स्थान।

• महिला अधिवक्ताओं के लिए सुरक्षित एवं सुविधाजनक कार्यस्थल।

• ई-फाइलिंग और अन्य डिजिटल सेवाओं के लिए अधिवक्ता सुविधा केंद्र।

• जरूरतमंद अधिवक्ताओं के बच्चों के लिए शिक्षा सहायता।

• गंभीर दुर्घटना एवं आकस्मिक परिस्थितियों के लिए आपातकालीन सहायता कोष।

• अधिवक्ता सुरक्षा संबंधी शिकायतों के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध प्रक्रिया।

संरक्षण का मतलब विशेषाधिकार नहीं, काम करने की स्वतंत्रता

अधिवक्ता प्रोटेक्शन एक्ट की प्रभावशीलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसमें कितनी धाराएं हैं। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या प्रस्तावित व्यवस्था अधिवक्ता को बिना भय, अनुचित दबाव और असुरक्षित परिस्थितियों के अपने पेशेवर दायित्व निभाने का वातावरण उपलब्ध कराती है।

सुरक्षा के साथ सामाजिक सुरक्षा को भी जोड़े जाने की आवश्यकता बताई गई है। युवा अधिवक्ता को शुरुआती दौर में सहयोग, वरिष्ठ अधिवक्ता को वृद्धावस्था में सुरक्षा, बीमार अधिवक्ता को उपचार एवं आय की चिंता से राहत तथा प्रत्येक अधिवक्ता को न्यायालय में सम्मानजनक कार्यस्थल उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी का कहना है कि छत्तीसगढ़ में अधिवक्ता संरक्षण पर होने वाली चर्चा को केवल “मारपीट के बाद कार्रवाई” तक सीमित न रखकर “पूरे पेशेवर जीवन की सुरक्षा” के व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।

उनके अनुसार इसका उद्देश्य अधिवक्ताओं को विशेषाधिकार देना नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अधिवक्ताओं के सुरक्षित कार्यस्थल, स्वास्थ्य, सम्मान और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े प्रश्नों को नीति-निर्माण में पर्याप्त महत्व दिलाना है।

अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर एवं सेशन कोर्ट, रायपुर

मो.: 9893354327

सह संपादक

Share this content:

Leave a Comment