“फलदार पेड़ पुत्र बराबर होते हैं” — माता श्यामा देवी की दूरदर्शिता बनी पर्यावरण संरक्षण की मिसाल करीब एक सदी पहले मुनगा का पेड़ बचाकर तालाब निर्माण का दिया सुझाव, आज भी प्रेरणा है शीतलकुंडा की विरासत

TEJASWI NATH SONI

July 5, 2026

मुंगेली। आज जब जल संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा पूरी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं, तब लगभग एक शताब्दी पहले छत्तीसगढ़ के शीतलकुंडा गांव की एक महिला द्वारा लिया गया निर्णय आज भी दूरदर्शिता, प्रकृति प्रेम और सामाजिक नेतृत्व की प्रेरणादायक मिसाल बना हुआ है। माता श्यामा देवी ने उस समय एक फलदार मुनगा के पेड़ को कटने से बचाते हुए तालाब निर्माण का सुझाव दिया, जिसने गांव के भविष्य की दिशा बदल दी।

जानकारी के अनुसार, वर्तमान मुंगेली क्षेत्र के शीतलकुंडा गांव में वर्षों पहले पेयजल का गंभीर संकट था। गांव में कई कुएं खुदवाए गए, लेकिन अधिकांश स्थानों पर केवल खारा पानी ही मिला। लगभग वर्ष 1925-30 के दौरान एक और कुआं खोदने की तैयारी की गई। भूमि चयन के लिए बुलाए गए पंडित ने बाड़ी में स्थित मुनगा के पेड़ के नीचे कुआं खोदने की सलाह दी।

उस समय नवविवाहिता बहू बनकर आईं माता श्यामा देवी ने इस प्रस्ताव का शांतिपूर्वक विरोध करते हुए कहा—

“खारा पानी तो का, हम करू पानी घलो पी लेबोन फेर मुनगा पेड़ नई काटन देबो।”

उन्होंने सभी को समझाया कि “फलदार पेड़ पुत्र बरोबर होथे”, इसलिए मीठे पानी की तलाश में एक जीवनदायी वृक्ष को काटना उचित नहीं होगा।

तालाब निर्माण का दिया सुझाव

माता श्यामा देवी ने कुआं खोदने के स्थान पर वर्षा जल संरक्षण के लिए गांव में तालाब निर्माण का सुझाव रखा। उन्होंने कहा कि इससे न केवल गांव के लोगों बल्कि पशु-पक्षियों को भी स्थायी जल स्रोत मिलेगा। ग्रामीणों और मालगुजार परिवार ने उनकी बात को स्वीकार करते हुए तालाब निर्माण का निर्णय लिया।

तालाब बनने के बाद वर्षा का जल उसमें भरने लगा और गांव में जल संकट काफी हद तक दूर हो गया। बाद में तालाब के चारों ओर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण भी किया गया, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ भूजल स्तर में भी सुधार हुआ।

समाज सुधार और महिला नेतृत्व की प्रतीक थीं माता श्यामा देवी

माता श्यामा देवी केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने महिलाओं को स्वच्छता, पारिवारिक संस्कार, सामाजिक जागरूकता तथा कुरीतियों के खिलाफ संगठित करने का भी कार्य किया। वे समाज में सकारात्मक बदलाव की प्रेरक शक्ति मानी जाती थीं।

आज भी प्रासंगिक है उनका संदेश

पर्यावरण संरक्षण और जल संवर्धन के क्षेत्र में माता श्यामा देवी की सोच आज भी प्रेरणा देती है। उनका संदेश—

“फलदार पेड़ पुत्र बरोबर होथे।”

आज के दौर में प्रकृति संरक्षण, जल संकट और सतत विकास के लिए एक महत्वपूर्ण सीख माना जाता है।

शीतलकुंडा का तालाब आज केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि माता श्यामा देवी की दूरदर्शिता, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और लोककल्याण की अमिट विरासत का प्रतीक बनकर आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित कर रहा है।

सह संपादक

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