छत्तीसगढ़ का नया धर्मांतरण विरोधी कानून संवैधानिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर आघात, तत्काल निरस्त करने की मांग: PUCL और ‘नजर’
*रायपुर, दिनांक 20 जून 2026*
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल), छत्तीसगढ़ एवं न्याय, जवाबदारी एवं अधिकारों के लिये राष्ट्रीय समन्वय (नजर), छत्तीसगढ़ ने प्रदेश की विधानसभा द्वारा पारित किए गए तथाकथित “धार्मिक स्वतंत्रता” विधेयक पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यह विधेयक भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त धर्म की स्वतंत्रता, अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर हमला है।
शनिवार को रायपुर में आयोजित एक दिवसीय सम्मेलन *‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम का सच’* में प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से आए वक्ताओं तथा पड़ोसी राज्यों से आए विशेषज्ञों ने नए धर्मांतरण विरोधी कानून को संविधान विरोधी बताते हुए कहा कि यह भारत की बहुलतावादी वास्तविकता को एकरूप धार्मिक राष्ट्रवाद की दृष्टि से देखने का प्रयास है तथा इसकी वापसी की मांग की।
चार सत्रों में आयोजित इस सम्मेलन के *प्रथम सत्र का संचालन प्रसाद राव द्वारा किया गया*। इस सत्र में बहुसंख्यकवादी राजनीति और धार्मिक आधार पर सामाजिक बहिष्कार से प्रभावित लोगों ने अपने अनुभव साझा किये।
इस सत्र में *फूलसिंह कचलाम (सीपीआई, नारायणपुर)* ने कहा कि धर्मांतरण का प्रश्न आदिवासी समाज को विभाजित करने के लिये इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिन क्षेत्रों में पहले ग्राम सभा की सहमति के बिना खनन परियोजनाओं के खिलाफ एक संगठित आदिवासी आंदोलन मौजूद था, आज उन्हीं समुदायों के भीतर धार्मिक आधार पर विभाजन पैदा किया जा रहा है जिससे सामूहिक संघर्ष कमजोर पड़ रहा है। उन्होंने केरल की ननों के साथ स्वेच्छा से जाने वाली तीन आदिवासी युवतियों की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें दुर्ग रेलवे स्टेशन पर बिना आधार रोका गया, बजरंग दल से जुड़े लोगों द्वारा प्रताड़ित किया गया और आज तक उनकी शिकायत पर उचित कार्रवाई नहीं हुई।
*बड़े तेवड़ा के पूर्व सरपंच राजमन सलाम* ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि चर्च जाने के कारण उन्हें और उनके परिवार को सामाजिक बहिष्कार और प्रशासनिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि उनके दिवंगत पिता—जो आदिवासी मूल धर्म का पालन करते थे—की कब्र को क्षतिग्रस्त कर उनका शव बाहर निकाल दिया गया और किसी अन्य स्थान पर दफना दिया गया। उन्होंने यह भी बताया कि इसके बाद उनकी सरपंच के रूप में भूमिका तथा उनकी पत्नी के आंगनवाड़ी कार्य से जुड़ी आजीविका पर भी असर पड़ा।
अन्य वक्ताओं ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और सामाजिक तनाव पर चिंता व्यक्त की और कहा कि ऐसे वातावरण में एक नया कठोर कानून लाना धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव और हिंसा को और वैधता प्रदान कर सकता है।
*दूसरे सत्र का संचालन दीपक साहू द्वारा किया गया।* इस सत्र में संवैधानिक बहुलतावादी मूल्यों पर राजनीतिक प्रहार, बहुलतावादी धार्मिक पहचान के इतिहास तथा डीलिस्टिंग जैसी संविधान विरोधी प्रक्रियाओं पर चर्चा हुई।
*सर्व आदिवासी समाज के प्रदेश उपाध्यक्ष आनंद टोप्पो* ने कहा कि आदिवासी पहचान केवल धार्मिक पहचान का प्रश्न नहीं है बल्कि इतिहास, भूगोल, समुदाय, संस्कृति, भाषा, सामाजिक संबंधों और ऐतिहासिक वंचना से निर्मित होती है।
*तुहिन देव (जन संघर्ष मोर्चा)* ने कहा कि वर्तमान समय में धार्मिक पहचान और धर्मांतरण के प्रश्न को जिस प्रकार से राजनीतिक रूप से उभारा जा रहा है, वह एक स्पष्ट रूप से फासीवादी राजनीतिक परियोजना का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि यह केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रश्न नहीं बल्कि संसाधनों, समुदायों और जन आंदोलनों को कमजोर करने वाली व्यापक साम्राज्यवादी राजनीतिक प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ है, जिसमें जनता की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक समस्याओं से ध्यान हटाकर विभाजन की राजनीति को बढ़ावा दिया जाता है।
*छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन से जुड़े बिजय भाई* ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में *PESA कानून* का उद्देश्य स्वशासन, संसाधनों पर सामुदायिक अधिकार और लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत करना था, लेकिन हाल के समय में इसका उपयोग “पादरियों को बाहर रखने” जैसे अभियानों के माध्यम से समुदायों के भीतर विभाजन पैदा करने के लिये किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इससे आदिवासी समाज की ऐतिहासिक रूप से घनिष्ठ सामाजिक संरचना कमजोर होती है।
*गुरु घासीदास सेवादार संघ के प्रमुख लाखन सुबोध* ने कहा कि संघ परिवार और आरएसएस ईसाई समुदाय के प्रश्न का राजनीतिक उपयोग कर अपना सामाजिक आधार और कैडर विस्तार करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इससे साम्प्रदायिक तनाव बढ़ता है और समाज के वास्तविक प्रश्न पीछे चले जाते हैं।
*तीसरे सत्र का संचालन समा द्वारा किया गया।* तीसरे सत्र में धर्मांतरण कानूनों की वास्तविकता बनाम मिथकीय प्रचार पर चर्चा करते हुए विभिन्न राज्यों के अनुभव साझा किये गये।
*उत्तर प्रदेश पीयूसीएल के महासचिव अधि. चित्तजीत मित्रा* ने उत्तर प्रदेश के अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि वहाँ धर्मांतरण विरोधी कानूनों का इस्तेमाल विशेष रूप से अंतरधार्मिक विवाह करने वाले जोड़ों के खिलाफ किया गया है। उन्होंने कहा कि ऐसे कानूनों ने युवाओं के निजी जीवन में भय, निगरानी और सामाजिक दबाव का वातावरण बनाया है तथा अंतरधार्मिक संबंधों को प्रशासनिक हस्तक्षेप का विषय बना दिया है।
*मध्य प्रदेश से आये डॉ. क्रिस्टी अब्राहम* ने कहा कि केवल कानूनी विरोध पर्याप्त नहीं होगा बल्कि साम्प्रदायिक हिंसा और धार्मिक आधार पर उत्पीड़न का सामना कर रहे लोगों के समर्थन में सामाजिक नेटवर्क, राहत तंत्र और नागरिक एकजुटता को मजबूत करने की आवश्यकता है। उन्होंने राज्यों के अनुभवों के आधार पर दस्तावेज़ीकरण, सहयोग और संगठित प्रतिरोध की आवश्यकता पर बल दिया।
वहीं *अधि. दीपाली गुप्ता* ने छत्तीसगढ़ के प्रस्तावित कानून में नागरिक अधिकारों और लोकतंत्र के लिये उत्पन्न चुनौतियों का विश्लेषण प्रस्तुत किया। वक्ताओं ने कहा कि अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा अपनी पसंद के धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार करने का अधिकार देता है तथा राज्य का दायित्व इस स्वतंत्रता की रक्षा करना है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक निगरानी, पूर्व सूचना अथवा अनुमति और कठोर दंडात्मक प्रावधान नागरिकों के निजी जीवन में राज्य के असंगत हस्तक्षेप को बढ़ावा देते हैं तथा महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और अन्य कमजोर वर्गों की स्वायत्तता पर संदेह खड़ा करते हैं।
सम्मेलन के *अंतिम सत्र* में *पीयूसीएल के महासचिव कलादास डेहरिया* और *नजर के अधि. दिवेश कुमार* ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ राज्य द्वारा नागरिकों के धार्मिक विकल्पों की निगरानी नहीं बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों की समान रूप से रक्षा करना है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक समाज में राज्य की भूमिका किसी विशेष धार्मिक पहचान को थोपने की नहीं बल्कि संविधान की मूल भावना—समानता, स्वतंत्रता, गरिमा और बहुलतावाद—की रक्षा करने की है।
सम्मेलन में कई प्रस्ताव पारित किये गये। सम्मेलन ने सर्वसम्मति से *छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम को अस्वीकार करने* का प्रस्ताव पारित किया। इसके साथ ही *अंतरधार्मिक विवाहों की स्वतंत्रता और वयस्क व्यक्तियों की स्वायत्तता के समर्थन में प्रस्ताव* पारित किया गया। हाल में विद्यालयों में बच्चों के लिये धार्मिक प्रार्थनाओं को अनिवार्य करने संबंधी निर्देशों के विरोध में भी प्रस्ताव पारित किया गया तथा कहा गया कि सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था संविधानसम्मत, समावेशी और धर्मनिरपेक्ष होनी चाहिए।
सम्मेलन में बस्तर की मानवाधिकार कार्यकर्ता *हिडमे मरकाम*, भीम आर्मी छत्तीसगढ़ अध्यक्ष *दिनेश आज़ाद*, मुस्लिम समुदाय के नेता *नुमान अकरम*, *एडवोकेट सुधीश चरण, एडवोकेट सोन सिंह झाली,पास्टर हारून दास*, भिलाई के *सज्जाद हुसैन*, गरियाबंद के *सेवक राम*, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के *बसंत साहू*, और *रमेश सूर्यवंशी* ने भी अपनी बात रखी।
सम्मेलन में यह भी निर्णय लिया गया कि इस कानून को न्यायिक चुनौती देने के लिये एक *याचिका तैयार की जाएगी* तथा इसके नियमों को अधिसूचित किये जाने और इसके क्रियान्वयन के विरुद्ध *व्यापक राजनीतिक एवं जन अभियान चलाया जाएगा*।
पीयूसीएल और नजर छत्तीसगढ़ ने राज्य सरकार से इस अधिनियम को तत्काल निरस्त करने की मांग की तथा सभी लोकतांत्रिक, मानवाधिकार और सामाजिक संगठनों से नागरिक स्वतंत्रताओं और संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिये एकजुट होने की अपील की।