विशेष रिपोर्ट: दीनदयाल उपाध्याय भूमिहीन योजना—पात्र मजदूर दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर, अपात्र उठा रहे लाभ
बलौदाबाजार। यह एक गंभीर विषय है। सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्तियों तक न पहुँचना और अपात्रों द्वारा इसका लाभ उठाना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े करता है। छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार द्वारा संचालित ‘दीनदयाल उपाध्याय भूमिहीन कृषि मजदूर कल्याण योजना’ की दूसरी किस्त कल बलौदाबाजार जिले से जारी होने वाली है। जहाँ एक ओर सरकार इस योजना को भूमिहीन मजदूरों के लिए ‘वरदान’ बता रही है, वहीं दूसरी ओर जिले के वास्तविक हितग्राही सिस्टम की खामियों के कारण दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
हैरानी की बात यह है कि बलौदाबाजार के कई ऐसे मजदूर हैं जो पूरी तरह भूमिहीन हैं और पोर्टल पर भी उन्हें ‘पात्र’ (Eligible) दिखाया जा रहा है। पंजीयन होने के बावजूद इन मजदूरों के खातों में योजना की राशि नहीं पहुँच रही है। समाधान खोजने के लिए ये मजदूर पंचायत से लेकर तहसील कार्यालय तक के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं, लेकिन अधिकारियों के पास “सर्वर डाउन” या “प्रक्रिया जारी है” जैसे रटे-रटाए जवाबों के अलावा कुछ नहीं है।
जमीनी हकीकत सरकार के दावों से उलट नजर आ रही है। स्थानीय स्तर पर यह शिकायतें आम हैं कि:
- कई ऐसे लोग जिनके पास स्वयं की कृषि भूमि है या जो जमीन के हिस्सेदार हैं, वे इस योजना का अनुचित लाभ उठा रहे हैं।
- वास्तविक भूमिहीन मजदूर, जिनके पास आय का कोई दूसरा साधन नहीं है, वे सरकारी फाइलों में उलझकर रह गए हैं।
- सालाना 10,000 रुपये की यह सहायता राशि उन लोगों तक नहीं पहुँच पा रही है जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
मजदूरों का कहना है कि वे अपनी मजदूरी छोड़कर दफ्तरों के चक्कर लगाते हैं, जिससे उनकी उस दिन की रोटी पर भी संकट आ जाता है। बलौदाबाजार जिले से किस्त जारी होने के उत्सव के बीच, ये वंचित मजदूर अब सरकार से न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
“हमारा नाम पोर्टल पर पात्र दिख रहा है, फिर भी पैसा क्यों नहीं आ रहा? अधिकारी सुनते नहीं और हम गरीब आदमी जाएँ तो कहाँ जाएँ?” – एक पीड़ित मजदूर
अब देखना यह होगा कि कल की किस्त जारी होने के बाद, क्या प्रशासन इन तकनीकी खामियों और अपात्रों के नाम काटने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाता है या ‘वरदान’ का यह दावा केवल कागजों तक ही सीमित रहेगा।