रायपुर। 23 दिसंबर 2025: राजनीतिक व्यंग्य की दुनिया में दो दिग्गज कलमों ने मोदी सरकार की ‘नाक कटवाने’ वाली नीतियों पर करारा प्रहार किया है। विष्णु नागर ने केरल अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह पर केंद्रित सेंसरशिप को ‘मूर्खता और अड़ियलपन’ करार दिया, तो राजेंद्र शर्मा ने नए ग्रामीण मजदूर कानून के नाम ‘जी राम जी’ को ब्रांडिंग का हथकंडा बताते हुए गांधी-राम विवाद खड़ा करने का आरोप लगाया। ये व्यंग्य प्रकाशनार्थ जारी किए गए हैं, जो राजनीतिक दादागिरी से लेकर सांस्कृतिक स्वतंत्रता तक की पड़ताल करते हैं।केरल फिल्म फेस्टिवल: सेंसरशिप का ‘पोटेमकिन’ ड्रामा, 14 फिल्में फिर भी रिलीज केरल के 30वें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने 19 फिल्मों पर रोक लगा दी थी। हंगामे के बाद सिर्फ 5 को मंजूरी मिली, लेकिन केरल सरकार ने बगावत कर सभी 19 दिखाने का ऐलान कर दिया। विष्णु नागर का व्यंग्य कहता है- सर्गेई आइंस्टीन की 100 साल पुरानी क्लासिक ‘बैटलशिप पोटेमकिन’ पर रोक, जो यूट्यूब पर फ्री उपलब्ध है! पीएम ने तो पुतिन से गले मिले, लेकिन उनकी पुरानी फिल्म पर सेंसर?फिलीस्तीनी फिल्में बैन: भारत में फिलीस्तीन समर्थन ‘अपराध’ बन गया, जबकि दुनिया की जनता इजरायल के खिलाफ।भारतीय फिल्म ‘संतोष’ पर रोक: पुलिस बर्बरता दिखाने पर सेंसर, मानो रोज की खबरें न दिख रही हों।सम्मानित फिल्मकार सिस्को की फिल्में: दो फिल्में रोकी गईं, कला पर गुंडागर्दी चरम पर।हिंदूवादी फिल्मों को बढ़ावा: मोदी सरकार ऐसी फिल्में प्रोत्साहित कर रही, जो नफरत उगलती हैं।नागर सवाल उठाते हैं- क्या ये फिल्में दिखाने से कम्युनिस्ट क्रांति हो जाएगी? केरल में सभी 14 बैन फिल्में दिखेंगी, सेंसर की हार हुई!’जी राम जी’ कानून: गांधी को राम से भिड़ाकर चाणक्य नीति? ब्रांडिंग का नया तीरदूसरे व्यंग्य में राजेंद्र शर्मा नए ग्रामीण मजदूर कानून के नाम ‘जी राम जी’ (शायद श्रमिकों के लिए कोई संक्षिप्त नाम) पर तंज कसते हैं। मोदी के चिंतकों की स्पेशलिटी- नामों से संस्कृत शब्द बनाना, लेकिन ‘जी राम जी’ भक्ति नहीं, बल्कि ‘सेवक-जमींदार’ भाव जगाता है। क्यों न ‘जै राम जी’ रखा?गांधी नाम हटाया, राम जोड़ा: 78 साल बाद कानून में राम आया, लेकिन गांधी के ‘हे राम’ को भुला दिया।विभाजन की चाणक्य नीति: हिंदू-मुस्लिम से आगे- नेहरू-पटेल, तिरंगा-केसरिया, गांधी-राम सबको लड़ाया।2024 नतीजों का असर? मोदी ब्रांड पर जंग लगी, विरोधी कानून के असर पर सवाल उठा रहे- गरीब मजदूरों, राज्यों का क्या होगा?शर्मा चेताते हैं- तीन कृषि कानूनों की तरह ये भी फांसी न बन जाए!लेखकों का परिचय: विष्णु नागर (जनवादी लेखक संघ उपाध्यक्ष, पुरस्कृत साहित्यकार) और राजेंद्र शर्मा (‘लोक लहर’ संपादक, वरिष्ठ व्यंग्यकार) ने इन व्यंग्यों से राजनीतिक मूर्खता पर आईना दिखाया। ये टुकड़े सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे, बहस छेड़ दी है।क्या ये व्यंग्य सेंसरशिप और विभाजनकारी राजनीति पर नया बहस का मोड़ लाएंगे? पूर्ण लेख मूल स्रोतों पर उपलब्ध।
