मान्यवर कांशीराम जी परिनिर्वाण दिवस (9 अक्टूबर): संघर्ष से समाज निर्माण तक

TEKRAM KOSLE

October 8, 2025

रिपोर्टर टेकराम कोसले

Masb news

9 अक्टूबर को मान्यवर कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस मनाया जाता है। कांशीराम जी ने बहुजन समाज को संगठित कर सामाजिक और राजनीतिक चेतना जगाई। जानिए उनके जीवन, विचार और योगदान के बारे में विस्तार से।

कांशीराम जी का परिचय

9 अक्टूबर का दिन बहुजन समाज के लिए सिर्फ़ एक तिथि नहीं, बल्कि प्रेरणा और संघर्ष की याद है। मान्यवर कांशीराम साहेब ने अपना पूरा जीवन समाज की बेड़ियों को तोड़ने, शिक्षा और संगठन के माध्यम से बहुजन वर्ग को सत्ता में हिस्सेदारी दिलाने के लिए समर्पित कर दिया।

वे कहते थे:
“जब तक सूरज चाँद रहेगा, साहब कांशीराम जी आपका नाम रहेगा।”

जन्म और प्रारंभिक जीवन

जन्म: खवासपुर, जिला रोपड़ (पंजाब)

शुरुआती जीवन: एक साधारण कर्मचारी के रूप में कार्य की शुरुआत

प्रेरणा: बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर और भगवान बुद्ध के विचार

उन्होंने संकल्प लिया कि –
“मैं न शादी करूँगा, न संपत्ति अर्जित करूँगा, अपना पूरा जीवन समाज के पुनर्निर्माण को समर्पित करूँगा।”

बामसेफ से लेकर बहुजन समाज पार्टी (BSP) तक

1964: नौकरी त्यागने के बाद सामाजिक आंदोलन की शुरुआत

1978: BAMCEF (Backward and Minority Communities Employees Federation) की स्थापना

1981: DS-4 (दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) की शुरुआत

1984: बहुजन समाज पार्टी (BSP) का गठन

कांशीराम जी की राजनीति का मूलमंत्र था:
“राजनीति सत्ता के लिए होती है, और सत्ता बिना संघर्ष के नहीं मिलती।”

समाज और राजनीति में योगदान

बहुजन, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग को राजनीति में सशक्त बनाया।

भारत की राजनीति को नई दिशा दी।

“शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो” के मंत्र को जीवन में उतारा।

उन्होंने स्पष्ट कहा था:
“जिस समाज की राजनीतिक जड़ें मज़बूत नहीं होतीं, उसका अस्तित्व टिक नहीं पाता।”

आज भी प्रासंगिक कांशीराम जी के विचार

आज जब समाज जातिगत भेदभाव, आर्थिक असमानता और सामाजिक विषमता से जूझ रहा है, तब कांशीराम साहेब के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं।
उनकी सोच आज के भारत को “समानता आधारित समाज” की ओर प्रेरित करती है।

भारत रत्न की मांग

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज तक कांशीराम साहेब को भारत रत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान से वंचित रखा गया है।

जिस तरह बाबा साहेब आंबेडकर को वर्षों बाद यह सम्मान मिला, उसी प्रकार अब समय है कि कांशीराम जी को भी यह मान्यता दी जाए।

वे केवल बहुजनों के नेता नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक-राजनीतिक पुनर्जागरण के शिल्पी थे।

बहन मायावती जी के नेतृत्व में आगे बढ़ता कारवां

कांशीराम साहेब का सपना आज भी बहन मायावती जी के नेतृत्व में जीवित है।
लखनऊ समेत पूरे देश में हर साल उनके परिनिर्वाण दिवस पर लाखों लोग जुटते हैं, जो यह दर्शाता है कि यह आंदोलन आस्था और सम्मान से भरा है, पैसे से जुटाई भीड़ नहीं।

कांशीराम साहेब का सपना स्पष्ट था:
“सत्ता की चाबी समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के हाथ में देना ही असली लोकतंत्र है।”

निष्कर्ष

मान्यवर कांशीराम जी का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि करोड़ों बहुजनों की आशाओं और संघर्ष की कहानी है।
उनका परिनिर्वाण दिवस हमें याद दिलाता है कि:
“जब तक सूरज चाँद रहेगा, साहब कांशीराम जी आपका नाम रहेगा।”

संपादक { समाचार }

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