स्मार्टफोन की स्क्रीन में खोता बचपन: सोशल मीडिया और रील्स की लत पर लेखक एच.पी. जोशी ने जताई गंभीर चिंता
नई दिल्ली: स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की रील्स की लत आज बच्चों के भविष्य के लिए शराब और अन्य नशीले पदार्थों से भी बड़ा अदृश्य खतरा बन चुकी है। यह विचार “मानव अधिकार के अनछुए पहलू” ग्रन्थ के लेखक, चिंतक और पुलिस अधिकारी एच.पी. जोशी ने अपने हालिया आलेख में व्यक्त किए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों के हाथ में तकनीक होना उन्हें ‘स्मार्ट’ नहीं बनाता, बल्कि असंयमित उपयोग उनके मानसिक विकास, नींद, खेलकूद और सामाजिक संवाद को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।
श्री जोशी के अनुसार, यह विषय अब सिर्फ घरों की चारदीवारी तक सीमित न रहकर बाल अधिकारों और संवैधानिक संरक्षण का अहम मुद्दा बन गया है:
- संवैधानिक प्रावधान: संविधान के अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन), 21A (शिक्षा) तथा अनुच्छेद 39(e) व 39(f) बच्चों के स्वस्थ विकास और संरक्षण की गारंटी देते हैं।
- अंतरराष्ट्रीय नियम: संयुक्त राष्ट्र का ‘कन्वेंशन ऑन द राइट्स ऑफ द चाइल्ड’ (CRC) भी बच्चों के सर्वोत्तम हित और डिजिटल वातावरण में सुरक्षा की वकालत करता है।
- न्यायिक सक्रियता: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नाबालिगों के सोशल मीडिया उपयोग पर सुरक्षा मानकों को लेकर केंद्र सरकार से मांगा गया जवाब यह साबित करता है कि यह गंभीर नीतिगत मामला है।
लेखक का मानना है कि बच्चों के स्क्रीन टाइम के लिए सिर्फ माता-पिता को दोषी ठहराना अधूरा दृष्टिकोण है। इसके लिए त्रिस्तरीय समाधान जरूरी है:
- परिवार: भोजन और सोने के समय स्क्रीन-फ्री नियम तथा बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना।
- विद्यालय व समाज: तकनीकी दक्षता के साथ डिजिटल अनुशासन और साइबर सुरक्षा का प्रशिक्षण।
- प्लेटफॉर्म व सरकार: नाबालिगों के लिए कड़े प्राइवेसी नियम, ऐज-वेरिफिकेशन और सुरक्षित एल्गोरिदम डिजाइन लागू करना।
श्री जोशी ने समाधान पर जोर देते हुए कहा कि उद्देश्य बच्चों से मोबाइल छीनना नहीं, बल्कि उनमें ‘डिजिटल विवेक’ पैदा करना है ताकि वे तकनीक के स्वामी बनें, गुलाम नहीं। रील्स दोबारा देखी जा सकती हैं, लेकिन खोया हुआ बचपन और समय कभी लौटकर नहीं आता।