राष्ट्रीय पांडुलिपि अभियान के तहत दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथों का सर्वेक्षण

SARJU PRASAD SAHU

May 7, 2026

बसना/सरायपाली। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय पांडुलिपि अभियान 2026 के अंतर्गत महासमुंद जिले में दुर्लभ पांडुलिपियों के सर्वेक्षण, पंजीकरण एवं डिजिटलीकरण का कार्य तेज़ी से किया जा रहा है। यह अभियान 16 मार्च 2026 से 15 मई 2026 तक संचालित किया जा रहा है। अभियान का उद्देश्य देशभर में सुरक्षित प्राचीन एवं दुर्लभ पांडुलिपियों की पहचान कर उन्हें संरक्षित करना है।

महासमुंद कलेक्टर के मार्गदर्शन में गठित समिति द्वारा जिले के विभिन्न संभावित स्थानों पर पहुंचकर पांडुलिपियों की खोज एवं सत्यापन किया जा रहा है। साथ ही ज्ञान भारतम् ऐप के माध्यम से पांडुलिपियों का पंजीकरण और अपलोडिंग भी की जा रही है। अभियान में पांडुलिपि संरक्षक, संस्थाओं के प्रमुख तथा आम नागरिक भी जानकारी साझा कर सहयोग कर सकते हैं।

इसी क्रम में विकासखंड सरायपाली में विकासखंड स्तरीय पांडुलिपि सर्वेक्षण समिति के सदस्य एवं सर्वेक्षक बीआरसी देवानंद नायक, भोलानाथ नायक, रविशंकर आचार्य, राजेश पटेल और दुष्यंत पटेल ने विभिन्न गांवों में पहुंचकर पांडुलिपियों का सत्यापन किया। सर्वेक्षण के दौरान यह पाया गया कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लोग प्राचीन धार्मिक ग्रंथ, इतिहास, लोकज्ञान, अनुष्ठान विधि तथा औषधीय ज्ञान से जुड़ी पांडुलिपियों को न केवल सुरक्षित रखे हुए हैं, बल्कि उनका उपयोग भी कर रहे हैं।

सर्वेक्षण में प्रकाश मिश्रा (झिलमिला) से 21, अमृतलाल प्रधान (बाराडोली) से 19, प्रफुल्ल भोई (पण्डापारा) से 5, किशोरी लाल (पण्डापारा) से 4, अंतर्यामी भोई (पण्डापारा) से 30, लक्ष्मण सेठ (पण्डापारा) से 15, नित्यानंद गौरमठ समिति (तोषगांव) से 20, सक्राजीत प्रधान (तोरेसिंहा) से 12 सहित विभिन्न संरक्षकों से कुल 202 पांडुलिपियां प्राप्त हुईं।

इन पांडुलिपियों में मुख्य रूप से उड़िया लिपि का प्रयोग किया गया है। इनमें भागवत पुराण, लक्ष्मी पुराण, दुर्गा ग्रंथ, भृंगु संहिता, ज्योतिष ज्ञान, जनजातीय धार्मिक संस्कार पद्धति, जड़ी-बूटी औषधि शास्त्र, पशु चिकित्सा, इतिहास तथा लोक परंपराओं से संबंधित महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं। कई पांडुलिपियां सचित्र हैं तथा उन्हें शाही कांटे या धातु के नुकीले औजार से उकेरा गया है, जो सैकड़ों वर्षों बाद भी स्पष्ट दिखाई देते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार इन दुर्लभ पांडुलिपियों से छत्तीसगढ़ और ओडिशा की सीमावर्ती संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आ सकती हैं। यह अभियान क्षेत्र की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

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