नई दिल्ली-हरियाणा-राजस्थान। 07 जनवरी 2026 सुप्रीम कोर्ट द्वारा 20 नवंबर 2025 को अरावली पर्वत श्रृंखला से संबंधित अपने ही फैसले पर रोक लगाए जाने के बावजूद, अरावली के भविष्य को लेकर चिंताएँ समाप्त नहीं हुई हैं। अदालत ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत उस संशोधित परिभाषा पर रोक लगाई है, जिसमें 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को “पहाड़ी” मानने से बाहर रखने का प्रावधान था। इस परिभाषा के लागू होने से अरावली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन का रास्ता खुलने की आशंका जताई जा रही थी।
इस फैसले के खिलाफ किसानों, महिलाओं, ग्रामीण मजदूरों, आदिवासियों और पर्यावरण संगठनों में व्यापक आक्रोश देखने को मिला। दबाव के चलते सुप्रीम कोर्ट ने 29 दिसंबर को मामले की तत्काल सुनवाई करते हुए न केवल अपने आदेश पर रोक लगाई, बल्कि अहम मुद्दों की समीक्षा के लिए एक नया पैनल गठित करने का भी निर्णय लिया।
उत्तर-पश्चिम भारत की जीवनरेखा
अरावली पर्वत श्रृंखला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जिसकी आयु लगभग 1.5 से 2.5 अरब वर्ष मानी जाती है। गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के 37 जिलों में फैली यह श्रृंखला लगभग 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है। विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली थार रेगिस्तान के पूर्व की ओर फैलाव को रोकने, मानसून पैटर्न को संतुलित रखने और भूजल पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और धूल भरी आंधियों के दौर में अरावली का क्षरण पूरे उत्तर भारत के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है। इसके बावजूद, अवैध खनन और वनों की कटाई पर प्रभावी रोक नहीं लग पाई है।
अवैध खनन और कॉर्पोरेट दबाव
स्थानीय लोगों और संगठनों का आरोप है कि पिछले कई दशकों से सत्ता-संरक्षित माफिया समूहों द्वारा अरावली में बेरहमी से खनन किया जा रहा है। अब खनन के साथ-साथ रियल एस्टेट परियोजनाओं, बहुमंजिला इमारतों, फार्महाउस और रिसॉर्ट के लिए भी पहाड़ियों को निशाना बनाया जा रहा है। हरियाणा के महेंद्रगढ़ और चरखी दादरी जैसे जिलों में ग्रामीणों ने हाल ही में पंचायतें और धरना-प्रदर्शन कर खनन बंद करने की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहाड़ों के भीतर विस्फोटक लगाकर किए जा रहे खनन से गांवों में भूकंप जैसे झटके महसूस होते हैं और घरों में दरारें पड़ रही हैं। भूगर्भीय जल निकासी से खेती भी प्रभावित हो रही है।
मरुस्थलीकरण का बढ़ता खतरा
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में मरुस्थलीकरण तेजी से बढ़ रहा है। हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के लाखों हेक्टेयर क्षेत्र पहले ही भूमि क्षरण की चपेट में हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि अरावली का दोहन कॉर्पोरेट मुनाफे के लिए जारी रहा, तो यह प्रक्रिया और तेज हो जाएगी।
संघर्ष जारी रहेगा
किसान और पर्यावरण संगठनों का स्पष्ट कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की रोक एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इससे संतुष्ट होने की कोई गुंजाइश नहीं है। उनका मानना है कि जब तक जमीनी स्तर पर अवैध खनन और कॉर्पोरेट कब्जे पर पूर्ण रोक नहीं लगती, तब तक अरावली और उससे जुड़ी करोड़ों लोगों की आजीविका सुरक्षित नहीं मानी जा सकती।