रायपुर 8 नवम्बर 2025।
सारंगढ़ टाइम्स नामक क्षेत्रीय समाचार पत्र में अनुसूचित जाति समुदाय के लिए अपमानजनक शब्द “हरिजन” का प्रयोग किए जाने पर विवाद गहराता जा रहा है। संबंधित खबर के प्रकाशन के बाद स्थानीय ग्रामीणों और भीम आर्मी भारत एकता मिशन ने अखबार के संपादक अमितेश केसरवानी के विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
जानकारी के अनुसार, 03 नवम्बर 2025 को प्रकाशित एक समाचार में लालधुआं, कपिस्दा, जोगनीपाली, धीरामढ़ा और बंजारी गांवों में 17 नवम्बर को होने वाली जनसुनवाई से संबंधित लेख में “हरिजन” शब्द का उपयोग किया गया था। यह शब्द अनुसूचित जाति वर्ग के लिए संविधानिक रूप से प्रतिबंधित और अपमानजनक माना जाता है।
🔹 स्थानीय लोगों और संगठनों में आक्रोश
प्रकाशन के बाद ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने इस खबर को जातिगत भेदभाव और समाज में नफरत फैलाने वाला कृत्य बताया।
भीम आर्मी के सदस्यों ने कहा कि —
“पत्रकारिता समाज का दर्पण है, न कि किसी वर्ग को नीचा दिखाने का मंच। इस प्रकार का शब्द प्रयोग न केवल गैरकानूनी है बल्कि सामाजिक सौहार्द के लिए भी हानिकारक है।”
🔹 कानूनी पृष्ठभूमि
यह उल्लेखनीय है कि 10 फरवरी 1982 को केंद्र सरकार ने आधिकारिक रूप से “हरिजन” शब्द के प्रयोग पर रोक लगाई थी।
साथ ही 24 मार्च 2017 को माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में कहा था कि —
“अनुसूचित जाति वर्ग के लिए ‘हरिजन’ शब्द अपमानजनक, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक है।”
न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि ऐसे शब्दों का उपयोग करने पर संबंधित व्यक्ति पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 (SC/ST Act) की धाराओं के अंतर्गत कार्रवाई की जा सकती है।
🔹 भीम आर्मी ने की कानूनी कार्रवाई की मांग
भीम आर्मी भारत एकता मिशन, जिला इकाई सारंगढ़ की ओर से आरोपी संपादक के विरुद्ध निम्न धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज करने की मांग की गई है —
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भारतीय दंड संहिता (BNS) की संबंधित धाराएं
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एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s)
भीम आर्मी का कहना है कि यह मामला केवल शब्दों का नहीं बल्कि मानव गरिमा, सामाजिक समानता और संवैधानिक अधिकारों का है। संगठन ने शासन से मांग की है कि दोषी पर सख्त कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति या संस्था ऐसे शब्दों के प्रयोग का दुस्साहस न करे।
🔹 पत्रकारिता की गरिमा पर सवाल
स्थानीय बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस घटना को पत्रकारिता की नैतिक मर्यादा का उल्लंघन बताया है।
उन्होंने कहा कि —
“पत्रकारिता का कार्य समाज को जागरूक करना है, न कि भेदभाव फैलाना। एक संपादक से अपेक्षा की जाती है कि वह शब्दों का चयन संवेदनशीलता के साथ करे, क्योंकि हर शब्द का सामाजिक प्रभाव होता है।”
🔹 संविधान की भावना के विपरीत
भारत का संविधान समानता और सम्मान का अधिकार प्रत्येक नागरिक को प्रदान करता है। अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के प्रति किसी भी प्रकार की अपमानजनक टिप्पणी या भेदभाव न केवल कानूनन अपराध है बल्कि संवैधानिक मूल्यों के विपरीत भी है।