बारनवापारा में घास प्रजाति पहचान एवं चारागाह विकास पर कार्यशाला संपन्न क्षेत्रीय प्रशिक्षण के माध्यम से चारागाह क्षेत्रों में मिला व्यावहारिक मार्गदर्शन

SARJU PRASAD SAHU

January 27, 2026

 

  बलौदाबाजार । 27 जनवरी 2026 बारनवापारा अभयारण्य क्षेत्र में घास प्रजातियों की पहचान एवं चारागाह विकास कार्यों को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला का उद्देश्य चारागाह क्षेत्रों के वैज्ञानिक विकास, स्थानीय घास प्रजातियों की पहचान तथा उनके संरक्षण एवं प्रबंधन को लेकर अधिकारियों एवं फील्ड स्टाफ को व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करना रहा।

कार्यशाला में विशेषज्ञ डॉ. जी. मूरतकर एवं डॉ. अरिहंत प्रधान द्वारा चारागाह विकास की आवश्यकता, उपयोगिता और दीर्घकालिक कार्यनीति पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। विशेषज्ञों ने बताया कि सुव्यवस्थित चारागाह विकास न केवल वन्यजीवों को प्राकृतिक आहार उपलब्ध कराता है, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और क्षेत्रीय जैव विविधता के संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाता है।

इस अवसर पर विभिन्न घास प्रजातियों के बीज संग्रहण, भंडारण एवं प्रबंधन की वैज्ञानिक विधियों की भी जानकारी दी गई, जिससे चारागाह विकास कार्यों को अधिक प्रभावी और टिकाऊ बनाया जा सके।

कार्यशाला के क्षेत्रीय प्रशिक्षण सत्र के अंतर्गत प्रतिभागियों को विस्थापित ग्राम नवापारा एवं चारागाह क्षेत्रों में ले जाकर स्थानीय घास प्रजातियों की पहचान कराई गई। मौके पर ही चारागाह विकास से जुड़े आवश्यक तकनीकी बिंदुओं पर व्यावहारिक चर्चा की गई। अधिकारियों को यह भी समझाया गया कि क्षेत्र में उपलब्ध घास प्रजातियों का सही आकलन कर उनके संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में योजनाबद्ध तरीके से कैसे कार्य किया जाए।

इस कार्यशाला में भोरमदेव बायोस्फीयर रिज़र्व एवं बलौदाबाजार वनमंडल के कोठारी एवं देवपुर परिक्षेत्रों से आए वनकर्मियों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम में बारनवापारा अभयारण्य के अधीक्षक कृषानू चन्द्राकार, वन परिक्षेत्र अधिकारी जीवन लाल साहू, संतोष कुमार पैकरा, प्रशिक्षु वनक्षेत्रपाल सुश्री कविता ठाकुर, सुश्री दीक्षा पाण्डेय, राहुल उपाध्याय सहित अन्य संबंधित अधिकारी एवं वनकर्मी उपस्थित रहे।

कार्यशाला के माध्यम से प्रतिभागियों को चारागाह विकास की वैज्ञानिक समझ प्राप्त हुई, जिससे भविष्य में अभयारण्य एवं वन क्षेत्रों में वन्यजीव संरक्षण को और अधिक मजबूती मिलने की अपेक्षा है।

सह संपादक

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