पंचायत विभाग द्वारा व्यावसायिक परीक्षा मंडल के माध्यम से आयोजित सहायक विकास विस्तार अधिकारी भर्ती प्रक्रिया विवादों में आ गई है। विवाद की मुख्य वजह ‘पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन रूरल डेवलपमेंट’ की मान्यता और उसके आधार पर दिए गए 15 अतिरिक्त अंकों को लेकर है। भर्ती नियमों के तहत, मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से पीजीडीआरडी डिप्लोमा धारक अभ्यर्थियों को।
15 अतिरिक्त अंक देने का प्रावधान था। 14 अगस्त को व्यापमं द्वारा लिखित परीक्षा के परिणाम घोषित किए गए, जिसके बाद विभाग ने डिप्लोमा धारकों को बोनस अंक देते हुए अंतिम सूची जारी की। इस बीच यह खुलासा हुआ कि कई अभ्यर्थियों ने दो निजी विश्वविद्यालय के प्रमाण पत्र जमा किए हैं। शिकायतों पर निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग ने एक जांच समिति गठित की।
नियमों को ताक पर रखने का आरोप
आरोप है कि जांच समिति की स्पष्ट रिपोर्ट के बावजूद, विनियामक आयोग ने पंचायत और उच्च शिक्षा विभाग को पत्र लिखकर ऐसे अभ्यर्थियों को पात्र मानने के निर्देश दिए। इसी पत्र के आधार पर विभाग ने 19 जनवरी 2026 को अंतिम पात्र सूची जारी कर दी। इस निर्णय से अन्य अभ्यर्थियों में भारी आक्रोश है। इस मामले में हाई कोर्ट में याचिका लगाई गई है।
मगर प्रश्न तब खड़ा हो जाता है ज़ब व्यवस्थाओं पर ही गंभीर सवाल दागे जाएं आखिर जाँच समिती के द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट जिसमें डिग्री को अपात्र कर दिया गया था वह रातों रात चमत्कार के रूप में बदल कैसे जाता है। क्या पैसे के खेल में सरकारी तंत्र फेल है..?
आखिर क्यूँ जाँच समिती कि रिपोर्ट को रातों रात पलट दिया जाता है और किसके दबाव में यह निर्णय लिया जाता है। सवाल तो उठेंगे खैर मामला कोर्ट में है और न्याय व्यवस्था पर सबकी निगाहें टिकी हुई है।