Tariffs: भारत-चीन-अमेरिका व्यापार में बदलाव, अवसर और चुनौतियों का नया परिदृश्य

MOTI LAL

August 23, 2025

Tariffs: भारत-चीन-अमेरिका व्यापार में बदलाव, अवसर और चुनौतियों का नया परिदृश्य

Tariffs: हाल के दिनों में भारत-चीन-अमेरिका के व्यापारिक समीकरण में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। एक तरफ अमेरिका ने भारत पर टैरिफ लगा कर अप्रत्याशित और एकतरफा रवैया अपनाया है, वहीं दूसरी ओर चीन ने भारत को उर्वरक, रेयर अर्थ मैटेरियल और टनल बोरिंग मशीनों के निर्यात पर लगी पाबंदियां हटाने की घोषणा की है। यह घटनाक्रम केवल व्यापारिक नहीं बल्कि व्यापक भू-आर्थिक और रणनीतिक मायने रखता है।

चार्टर्ड अकाउंटेंट और वैश्विक व्यापार विशेषज्ञ शुभम सिंघल के अनुसार, सतही तौर पर देखें तो अमेरिका की टैरिफ से जुड़ी कार्रवाई अप्रत्याशित लगती है, लेकिन इसके पीछे वैश्विक भू-राजनीति और अर्थव्यवस्था की जटिलताएं छिपी हैं। वहीं, चीन की ओर से राहत भरा कदम भारत के लिए कुछ अवसर पैदा करता है, लेकिन इसके लिए सावधानी बरतना भी उतना ही जरूरी है। यदि भारत चीन की नरमी को देखते हुए आंख बंद कर भरोसा करता है, तो यह भविष्य में जोखिम बन सकता है।

सिंघल बताते हैं कि चीन अक्सर व्यापार को राजनीतिक दबाव का उपकरण बनाता है। ऐसे में भारत की नीति सावधानी और सहयोग दोनों का संतुलन बनाए रखनी चाहिए। चीन से सस्ते उर्वरक और कच्चे माल की आपूर्ति से महंगाई पर नियंत्रण रखने और उद्योगों को राहत देने में मदद मिलेगी। इस स्थिति का लाभ उठाकर रिजर्व बैंक मौद्रिक नीतियों में लचीलापन रख सकता है। इसके अलावा, यह निवेशकों को सकारात्मक संदेश भी देता है कि भारत अवसरों का व्यावहारिक और संतुलित उपयोग करना जानता है।

भारत को अपने व्यापार घाटे और आत्मनिर्भरता के लक्ष्य पर भी सतर्क रहना होगा। अगर चीन के सस्ते सामान पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ी, तो ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों पर असर पड़ सकता है। इसलिए चीन से होने वाले आयात का उपयोग केवल उत्पादन क्षमता और तकनीकी उन्नति तक सीमित रखना चाहिए।

Tariffs: भारत-चीन-अमेरिका व्यापार में बदलाव, अवसर और चुनौतियों का नया परिदृश्य
Tariffs: भारत-चीन-अमेरिका व्यापार में बदलाव, अवसर और चुनौतियों का नया परिदृश्य

अमेरिका के रवैये को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हाल ही में अमेरिका ने अपने दोस्ताना संबंध वाले भारत पर टैरिफ लगाकर एकतरफा रवैया अपनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत अपने किसानों, मजदूरों और घरेलू उद्योगों से किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। भारत ने अमेरिका के दबाव के सामने घुटने टेकने से साफ इंकार कर दिया।

सिंघल के अनुसार भारत के पास अमेरिकी टैरिफ से निपटने के कई विकल्प हैं। भारत की ताकत केवल घरेलू अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों जैसे ब्रिक्स, जी20 और एससीओ पर भी यह निर्णायक शक्ति बन चुका है। अमेरिका की धमकियों के बीच भारत ने अपनी रणनीति और साझेदारी के नए विकल्प तलाशे हैं।

विशेषकर ब्रिक्स समूह अब और मजबूत हो गया है, जिसमें यूएई, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया भी शामिल हैं। ब्रिक्स की संयुक्त अर्थव्यवस्था $32.5 ट्रिलियन से अधिक और वैश्विक कारोबार में लगभग 40% हिस्सेदारी रखती है। विदेश मंत्री एस जयशंकर के रूस दौरे और पुतिन से मुलाकात के दौरान रूस ने भारत के साथ समर्थन देने की मंशा जाहिर की।

भारत ने डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए भी कदम उठाए हैं। रूस से तेल के लिए रुपये-रूबल भुगतान और यूएई के साथ करेंसी स्वैप व्यवस्था इसका उदाहरण है। इसके अलावा, भारत दुनिया की 60% जेनरिक दवाओं का निर्यात करता है। अमेरिकी टैरिफ की स्थिति में इसका बोझ अमेरिका के आम नागरिक पर पड़ेगा।

अंततः, भारत न तो चीन पर आंख बंद कर भरोसा करेगा और न ही अमेरिकी दबाव में आएगा। भारत का संदेश स्पष्ट है – संबंध अच्छे रहेंगे, व्यापार होगा, लेकिन राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहेंगे। चीन से मिलने वाले अवसरों का लाभ लिया जाएगा, पर निर्भरता नहीं बनाई जाएगी। अमेरिका के साथ सहयोग होगा, पर शर्तों पर नहीं। इस संतुलित और रणनीतिक दृष्टिकोण से भारत वैश्विक मंच पर आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर शक्ति के रूप में खड़ा रहेगा।

प्रधान संपादक

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