
रिपोर्टर टेकराम कोसले
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के पाली–पड़निया क्षेत्र में South Eastern Coalfields Limited (SECL) कुसमुंडा प्रबंधन पर ग्रामीणों की जमीन पर बिना ग्राम सभा कराए अवैध कब्जा करने का गंभीर आरोप लगा है।
ग्रामीणों का कहना है कि SECL के अधिकारियों ने बिना किसी पूर्व सूचना और सहमति के उनकी उपजाऊ कृषि भूमि पर भारी मशीनें चलाकर समतलीकरण कर दिया, जिससे उनकी फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गईं और आजीविका पर संकट खड़ा हो गया है।
बिना मुआवजा और पुनर्वास के कब्जे का आरोप
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि SECL के जीएम सचिन ताना पाटील और सर्वे अधिकारी नवीन चंद्र के नेतृत्व में बिना उचित मुआवजा, पुनर्वास और बसाहट दिए ही जमीन अधिग्रहण की कार्रवाई की जा रही है।
इस कार्रवाई से प्रभावित परिवारों का कहना है कि उनके पास अब खेती का कोई साधन नहीं बचा, जिससे उनका जीवनयापन संकट में पड़ गया है।
पैदल मार्च रोकने की कोशिश, फिर भी निकला विरोध
घटना के विरोध में 18 मार्च 2026 को पाली–पड़निया के भू-विस्थापित ग्रामीणों और छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के कार्यकर्ताओं ने सैकड़ों की संख्या में शांतिपूर्ण पैदल मार्च निकाला।
यह मार्च मां सर्वमंगला मंदिर से शुरू होकर लगभग 10 किलोमीटर चलते हुए कलेक्टर कार्यालय तक पहुंचा।
इस दौरान प्रशासनिक अधिकारी जैसे चौकी प्रभारी, तहसीलदार और SDM मौके पर मौजूद रहे और मार्च को रोकने का प्रयास भी किया गया, लेकिन ग्रामीण अपनी मांगों को लेकर डटे रहे।
कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन, 5 दिन का अल्टीमेटम
प्रदर्शनकारियों ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर ज्ञापन सौंपा और 5 दिनों के भीतर समस्याओं का समाधान करने की मांग की।
ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि यदि समय सीमा में कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन और उग्र हो सकता है।
पांचवी अनुसूची और PESA कानून का उल्लंघन
ग्रामीणों का आरोप है कि यह पूरा मामला संविधान और कानून का खुला उल्लंघन है, खासकर:
Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 (PESA Act)
Fifth Schedule of the Indian Constitution
क्या कहते हैं ये कानून?
ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य:
PESA कानून के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की पूर्व अनुमति के बिना भूमि अधिग्रहण नहीं किया जा सकता।
भूमि पर ग्राम सभा का अधिकार:
ग्राम सभा को जनजातीय जमीन की रक्षा, संसाधनों के प्रबंधन और विवाद समाधान का अधिकार प्राप्त है।
अवैध कब्जा हटाने की शक्ति:
ग्राम सभा को अवैध कब्जे को हटाने की भी शक्ति दी गई है।
ग्रामीणों की मांगें
अवैध रूप से कब्जाई गई जमीन वापस की जाए
उचित मुआवजा और पुनर्वास दिया जाए
ग्राम सभा की सहमति के बिना कोई अधिग्रहण न हो
जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए
निष्कर्ष
पाली–पड़निया का यह मामला एक बार फिर जल, जंगल और जमीन के अधिकार को लेकर उठ रहे सवालों को उजागर करता है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल स्थानीय प्रशासन बल्कि कानून व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में कितनी तेजी और पारदर्शिता से कार्रवाई करता