भारतीय संस्कृति की पहचान को लेकर चल रही बहस के बीच गंगा-जमुनी तहजीब को लेकर एक बार फिर वैचारिक विमर्श तेज हो गया है। हिन्दुत्व समर्थक विचारकों द्वारा भारतीय संस्कृति को एकांगी रूप से हिन्दू संस्कृति बताने के दावों के विपरीत इतिहास, साहित्य, संगीत, स्थापत्य और सामाजिक परंपराएं यह स्पष्ट करती हैं कि भारत की सांस्कृतिक पहचान बहुलतावादी और समन्वयात्मक रही है।
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हाल ही में कोलकाता में आयोजित “हिन्दू धर्म की हिन्दुत्व से रक्षा आवश्यक है” विषयक विचार-विमर्श में कुछ वक्ताओं ने गंगा-जमुनी तहजीब को आज़ादी के बाद गढ़ा गया मिथक बताया। उनका कहना था कि इसे नेहरूवादी और मार्क्सवादी इतिहासकारों ने बढ़ावा दिया। लेकिन इतिहासकारों और सामाजिक अध्येताओं का मानना है कि यह सोच ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है।
गंगा-जमुनी तहजीब से आशय उस मिश्रित संस्कृति से है, जो हिन्दुओं और मुसलमानों के लगभग एक हजार वर्षों के सह-अस्तित्व के दौरान विकसित हुई। सातवीं सदी में भारत में इस्लाम के आगमन के बाद सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक स्तर पर दोनों समुदायों के बीच व्यापक अंतःक्रिया हुई। मध्यकाल में सल्तनत और मुगल शासन के दौरान यह समन्वय और अधिक गहरा हुआ। इतिहासकारों के अनुसार, मुस्लिम शासकों का मुख्य उद्देश्य सत्ता और प्रशासन था, न कि स्थानीय संस्कृति का विनाश। इसी प्रक्रिया में साझा परंपराओं ने जन्म लिया, जो आज भी देश के कई हिस्सों में जीवित हैं।
प्रख्यात इतिहासकार बी. एन. पांडे के अनुसार, हिन्दू भक्ति आंदोलन और इस्लामी सूफी परंपरा के संगम से प्रेम, समर्पण और मानवतावादी मूल्यों पर आधारित एक नई सांस्कृतिक धारा विकसित हुई। इस संगम ने साहित्य, संगीत, चित्रकला और स्थापत्य को समृद्ध किया और भारतीय इतिहास को एक विशिष्ट पहचान दी।
संगीत के क्षेत्र में ख्याल, ठुमरी और ग़ज़ल जैसी शैलियां हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक संवाद का परिणाम हैं। बीजापुर के शासक इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय के दरबार में सैकड़ों हिन्दू गायक थे। उन्होंने स्वयं ‘किताब-ए-नवरंग’ की रचना की, जिसमें देवी सरस्वती की स्तुति भी शामिल है। इसी तरह रहीम, रसखान और सैयद वाजिद शाह जैसे मुस्लिम कवियों ने हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं में भक्ति और प्रेम से ओतप्रोत साहित्य रचा।
भाषा के स्तर पर फारसी और स्थानीय बोलियों के मेल से उर्दू का विकास हुआ, जिसे कई हिन्दू साहित्यकारों ने भी समृद्ध किया। स्थापत्य कला में भी हिन्दू और इस्लामी शैलियों के मिश्रण से आगरा किला, फतेहपुर सीकरी और राजस्थान-मध्यप्रदेश की हवेलियों जैसी अनूठी कृतियां सामने आईं।
सामाजिक जीवन में त्योहारों की साझी परंपराएं गंगा-जमुनी तहजीब का जीवंत उदाहरण हैं। दीवाली को ‘जश्न-ए-चिराग’ और होली को ‘जश्न-ए-गुलाबी’ के रूप में मनाया जाना आम था। मैसूर में टीपू सुल्तान के शासनकाल में दशहरा राजकीय संरक्षण में मनाया जाता था। आज भी महाराष्ट्र की वारकरी परंपरा में हिन्दू-मुस्लिम सहभागिता देखने को मिलती है।
राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी यह साझेदारी स्पष्ट रही है। अकबर के दरबार में हिन्दू नवरत्न, औरंगजेब के शासन में बड़ी संख्या में हिन्दू अधिकारी तथा शिवाजी महाराज की सेना में मुस्लिम सेनानायक इस साझा इतिहास के प्रमाण हैं।
जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में भारत को एक ऐसी सभ्यता बताया है, जिसमें समय-समय पर नई सांस्कृतिक परतें जुड़ती रहीं, लेकिन पुरानी परतें पूरी तरह मिटीं नहीं। इसी निरंतरता और समन्वय से भारत की बहुरंगी पहचान बनी।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में जब साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद और घृणा आधारित राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है, तब गंगा-जमुनी तहजीब के मूल्यों सहअस्तित्व, संवाद और सांस्कृतिक साझेदारी—को संरक्षित करना और भी आवश्यक हो गया है। यही भारतीय संस्कृति की वास्तविक आत्मा है।