कुंजराम यादव, बसना रिपोर्टर
बसना। पिथौरा ब्लॉक अंतर्गत वन कक्ष क्रमांक 256 पिपरौद एवं कंचनपुर वन कक्ष क्रमांक 287 क्षेत्र में जर्जर सड़क को लेकर ग्रामीणों में भारी नाराजगी देखी जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि आजादी के 77 वर्ष बाद भी वे गड्ढों से भरे कच्चे और खस्ताहाल मार्ग पर चलने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि वर्षों से जिला कलेक्टर, वन विभाग के अधिकारियों एवं क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों को ज्ञापन सौंपकर सड़क निर्माण की मांग की जा रही है। कई बार जनप्रतिनिधियों को मौखिक रूप से भी अवगत कराया गया, लेकिन हर बार आश्वासन ही मिला।
ग्रामीण राजेश साव ने सवाल उठाते हुए कहा कि जर्जर मार्ग के कारण एम्बुलेंस और अन्य शासकीय वाहन समय पर गांव तक नहीं पहुंच पाते। आपातकालीन स्थिति, विशेषकर गर्भवती महिलाओं या गंभीर बीमार मरीजों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। एम्बुलेंस बुलाने पर वह देर से पहुंचती है, जिससे मरीजों की हालत और बिगड़ जाती है।
क्षेत्र के बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है। शासकीय हाईस्कूल सांकरा एवं कॉलेज पिथौरा जाने वाले विद्यार्थियों को 14 से 16 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है। कई अभिभावक खराब सड़क के कारण बच्चों की पढ़ाई बंद कराने को मजबूर हो रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि बारिकपाली, पंडरीपानी, कंचनपुर से पिपरौद एवं पौसराडिपा तक प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत सड़क बन सकती है, तो उनके क्षेत्र में भेदभाव क्यों? सड़क निर्माण से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के नए अवसर खुल सकते हैं।
बताया गया कि वर्ष 2023 में ग्रामीणों एवं स्कूली बच्चों ने महासमुंद कलेक्ट्रेट पहुंचकर तत्कालीन कलेक्टर श्री नीलेश कुमार क्षीरसागर को ज्ञापन सौंपा था। सड़क का सर्वे और नाप भी हुआ, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ सका।
वर्तमान जिला कलेक्टर श्री विनय कुमार लहंगे ने कहा है कि यदि स्टिमेट तैयार है तो स्वीकृति दी जाएगी, अन्यथा अधिक राशि की आवश्यकता होने पर राज्य शासन से सहयोग लिया जाएगा। उन्होंने ग्रामीणों को आश्वस्त किया कि समस्या के समाधान के लिए प्रशासन पूर्ण सहयोग करेगा।
ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2021 में पूर्व सरपंच राजेश साव के कार्यकाल में लगभग 80 लाख रुपये का स्टिमेट तैयार हुआ था, लेकिन वह कागजों तक सीमित रह गया।
अब क्षेत्रवासियों के मन में कई सवाल हैं—
क्या जर्जर सड़क का शीघ्र निराकरण होगा?
क्या एम्बुलेंस और शासकीय सुविधाएं समय पर मिल पाएंगी?
क्या बच्चों का शिक्षा का सपना साकार होगा?
ग्रामीणों की निगाहें अब प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की अगली पहल पर टिकी हैं।