समानता बनाम मनुवाद : यूजीसी नियमावली पर उठते सवाल और सामाजिक बहस

TEJASWI NATH SONI

February 15, 2026

(आलेख : विक्रम सिंह)

नई दिल्ली/विशेष।

उच्च शिक्षा संस्थानों में समान अवसर सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा जारी “प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस” नियमावली को लेकर देशभर में तीखी बहस छिड़ गई है। एक ओर इसे जाति-आधारित भेदभाव के विरुद्ध संस्थागत कदम माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ समूहों द्वारा इसका विरोध किया गया है। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा, जहां फिलहाल नियमावली पर रोक लगा दी गई है।

क्या है नियमावली का उद्देश्य?

यूजीसी की इस पहल के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान में ‘समान अवसर केंद्र’ (Equal Opportunity Cell) के गठन का प्रावधान किया गया है। इसके अंतर्गत एक समानता समिति बनाई जानी है, जो जाति-आधारित भेदभाव सहित अन्य असमानताओं से संबंधित शिकायतों की सुनवाई करेगी।

नियमावली में 24 घंटे हेल्पलाइन, इक्विटी स्क्वाड, इक्विटी एम्बेसडर तथा नियमित रिपोर्टिंग की व्यवस्था का प्रस्ताव है। साथ ही, शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई और अपील के लिए ओम्बड्समैन की व्यवस्था भी सुझाई गई है।

विरोध और समर्थन : दो ध्रुव

नियमावली के विरोध में यह तर्क दिया गया कि इससे समाज में विभाजन की भावना बढ़ सकती है तथा इसका दुरुपयोग संभव है। वहीं समर्थकों का कहना है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं, ऐसे में एक संस्थागत तंत्र की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

विभिन्न सामाजिक संगठनों और छात्र आंदोलनों ने इसे रोहित वेमुला, पायल तड़वी और अन्य मामलों के संदर्भ में महत्वपूर्ण कदम बताया है, जिनमें संस्थागत भेदभाव के आरोप लगे थे।

न्यायालय की भूमिका और आगे की राह

सर्वोच्च न्यायालय ने नियमावली पर अंतरिम रोक लगाते हुए विस्तृत सुनवाई का निर्णय लिया है। न्यायालय की टिप्पणियों और आदेशों को लेकर भी सामाजिक-राजनीतिक विमर्श जारी है।

विशेषज्ञों का मत है कि यदि नियमावली में संरचनात्मक कमियां हैं, तो उन्हें दूर कर इसे और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। कई शिक्षाविदों ने सुझाव दिया है कि समिति गठन में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए तथा इसे सभी केंद्रीय एवं स्वायत्त संस्थानों तक विस्तारित किया जाए।

आंकड़े क्या कहते हैं?

यूजीसी और ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्षों में जाति-आधारित शिकायतों में वृद्धि दर्ज की गई है। इसे देखते हुए समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस नीति-निर्माण की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।

सामाजिक विमर्श का केंद्र

यह बहस केवल एक नियमावली तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय समाज में समानता, न्याय और सामाजिक संरचना से जुड़े व्यापक प्रश्नों को सामने ला रही है। समर्थकों का मानना है कि ऐतिहासिक असमानताओं को स्वीकार कर ही वास्तविक समानता की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकते हैं, जबकि विरोधी पक्ष इसे सामाजिक संतुलन के लिए चुनौतीपूर्ण मानता है।

आखिरकार, यह प्रश्न देश के लोकतांत्रिक विमर्श के केंद्र में है—क्या उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के लिए एक सशक्त तंत्र आवश्यक है, और यदि हां, तो उसका स्वरूप कैसा हो?

(लेखक का दृष्टिकोण उनके निजी विचार हैं।)

District Bureau Chief BALODA BAZAR

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