सुप्रीम कोर्ट में ‘जाति संवेदीकरण समिति’ की मांग तेज आंबेडकरवादी वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश को सौंपा ज्ञापन, जातिगत भेदभाव पर उठाए गंभीर सवाल

SARJU PRASAD SAHU

February 1, 2026

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति–जनजाति के वकीलों और कर्मचारियों के साथ कथित जातिगत भेदभाव को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती की पूर्व संध्या पर सुप्रीम कोर्ट के आंबेडकरवादी वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ को ज्ञापन सौंपकर कोर्ट में “जाति संवेदीकरण समिति” के गठन की मांग की है।

13 अप्रैल 2023 को सुप्रीम कोर्ट के पुस्तकालय में आयोजित पुष्पांजलि कार्यक्रम में पहली बार मुख्य न्यायाधीश स्वयं शामिल हुए। इसी अवसर का उपयोग करते हुए डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर सामाजिक न्याय अधिवक्ता समूह के अध्यक्ष एडवोकेट प्रतीक आर. बॉमबार्डे ने मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट में न केवल एससी–एसटी वकीलों, बल्कि रजिस्ट्री और प्रशासनिक कर्मचारियों के साथ भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जातिगत भेदभाव किया जाता है, जिसकी सुनवाई के लिए कोई संस्थागत मंच मौजूद नहीं है।

ज्ञापन में मुख्य रूप से तीन मांगें रखी गईं।

सुप्रीम कोर्ट में जाति संवेदीकरण समिति का गठन

कोर्ट परिसर में डॉ. बी.आर. आंबेडकर की प्रतिमा की स्थापना

14 अप्रैल को स्थायी अवकाश घोषित किया जाए

एडवोकेट प्रतीक बॉमबार्डे का कहना है कि वर्तमान में केवल न्यायिक अधिकारियों के लिए सीमित स्तर पर जाति संवेदीकरण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जबकि वकीलों, कर्मचारियों और सीधे नियुक्त न्यायाधीशों के लिए कोई समग्र व्यवस्था नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि समिति गठित होती है तो एससी–एसटी समुदाय के साथ होने वाले भेदभाव की शिकायतों को सुनने के लिए एक औपचारिक मंच उपलब्ध होगा।

जेंडर संवेदीकरण तो है, जाति पर चुप्पी क्यों?

वकीलों ने सवाल उठाया कि जब सुप्रीम कोर्ट में जेंडर संवेदीकरण और आंतरिक शिकायत समिति जैसी प्रभावी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, तो जाति आधारित भेदभाव के लिए अब तक कोई समानांतर तंत्र क्यों नहीं बनाया गया। हाल के वर्षों में न्यायपालिका द्वारा जेंडर और एलजीबीटीक्यू अधिकारों को लेकर उठाए गए कदमों का हवाला देते हुए वकीलों ने कहा कि जाति का प्रश्न भी उतना ही गंभीर और संवेदनशील है।

रिपोर्ट्स और घटनाओं से पुष्ट होता भेदभाव

2001 की संसदीय समिति और 2014 के राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की रिपोर्टों में न्यायपालिका में जातिगत पूर्वाग्रह की पुष्टि की जा चुकी है। इसके अलावा, हाल के वर्षों में हाई कोर्ट और निचली अदालतों से जुड़े कई बयान और घटनाएं भी इस पूर्वाग्रह की ओर इशारा करती हैं। अमेरिकन बार एसोसिएशन की 2021 की रिपोर्ट में भी दलित वकीलों के साथ होने वाले संस्थागत और पेशेवर भेदभाव का विस्तार से उल्लेख किया गया है।

पदोन्नति और नियुक्तियों में भी सवाल

सुप्रीम कोर्ट के कर्मचारियों के लिए पदोन्नति में आरक्षण का अभाव, सरकारी पैनल वकीलों और एमिकस क्यूरी की नियुक्ति में दलित–बहुजन प्रतिनिधित्व की कमी, तथा लॉ क्लर्क भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण न होना भी गंभीर मुद्दों के रूप में सामने आए हैं।

अब भी इंतजार

मुख्य न्यायाधीश द्वारा ज्ञापन स्वीकार किए जाने के बावजूद अब तक इन मांगों पर कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया है। आंबेडकरवादी वकीलों का कहना है कि जाति संवेदीकरण समिति का गठन सुप्रीम कोर्ट में समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल साबित हो सकता है।

यह आलेख दो वर्ष पूर्व लिखा गया था, किंतु यूजीसी दिशा-निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया स्थगन के संदर्भ में आज भी उतना ही प्रासंगिक माना जा रहा है।

सह संपादक

Share this content:

Leave a Comment