गरियाबंद। जिले में स्कूल मरम्मत कार्यों को लेकर एक बार फिर बड़ा भ्रष्टाचार सामने आने की चर्चा तेज हो गई है। वर्ष 2024 में प्राथमिक, मिडिल और हाई स्कूलों में फर्श, किचन, शौचालय, दरवाज़ा-खिड़की सहित अन्य आवश्यक मरम्मत कार्यों के लिए लगभग 115 स्कूलों में 40 हजार से 1 लाख 20 हजार रुपए तक की राशि स्वीकृत की गई थी। कुल मिलाकर यह राशि 60 लाख रुपए से अधिक बताई जा रही है।
लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आ रही है। आरोप है कि अधिकांश स्कूलों में मरम्मत कार्य फाइलों तक ही सीमित रह गया। कई जगहों पर केवल शौचालय की दीवारों में रंग-रोगन कर औपचारिकता निभा दी गई, जबकि कुछ स्कूलों में तो सिर्फ कागजों में ही मरम्मत दर्शा दी गई।
विभाग और एजेंसियों पर बंदरबांट के आरोप
जानकारी के अनुसार सर्व शिक्षा अभियान विभाग और कार्य एजेंसियों के बीच मिलीभगत से बड़ी राशि का बंदरबांट हुआ। मरम्मत के नाम पर राशि जारी तो पूरी की गई, लेकिन कार्य अधूरा या नगण्य स्तर का किया गया। 2 प्रतिशत जीएसटी काटकर एजेंसियों को भुगतान किया गया, पर गुणवत्ता और वास्तविक कार्य पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अब फंस रहे जिम्मेदार, फोटो-प्रमाण पत्र का सहारा
मामला तब और गरमाया जब जिला पंचायत सीईओ द्वारा मरम्मत कार्यों के फोटोग्राफ्स के साथ प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए। अब निर्माण एजेंसियों और संबंधित अधिकारियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है, क्योंकि कई जगह कार्य हुआ ही नहीं।
सूत्रों के मुताबिक अब बाहर के रंग-रोगन और दूसरे स्कूलों के शौचालयों के फोटो लगाकर प्रमाण पत्र देने की तैयारी चल रही है। इसको लेकर अंदरखाने रायशुमारी भी शुरू हो चुकी है, ताकि किसी तरह मामले को दबाया जा सके।
मैनपुर, देवभोग क्षेत्र में ज्यादा शिकायतें
खासतौर पर मैनपुर और देवभोग क्षेत्रों से इस तरह की शिकायतें ज्यादा सामने आ रही हैं। स्थानीय स्तर पर कई बार शिकायत और मीडिया में खबरें आने के बावजूद अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है।
सीईओ की निगरानी में जांच की मांग
अब पूरे मामले में जिला पंचायत सीईओ की निगरानी में निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी संकेत दिए हैं कि इस बार मामले की शिकायत उच्च स्तर तक की जाएगी, ताकि वर्षों से चल रहे इस खेल पर रोक लग सके।
लोगों का कहना है कि यदि इस बार सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो 2025-26 के मरम्मत कार्य भी इसी तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएंगे।
निष्कर्ष:
स्कूलों की मरम्मत के नाम पर लाखों रुपए खर्च होने के बावजूद जमीनी स्तर पर काम नजर नहीं आना गंभीर सवाल खड़े करता है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस बार क्या सख्त कदम उठाता है या फिर मामला एक बार फिर फाइलों में ही सिमट कर रह जाएगा।