काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के नाम पर धरोहरों के ध्वंस का आरोप, हिंदू धर्म के स्वरूप बदलने की साजिश : बादल सरोज

SARJU PRASAD SAHU

January 24, 2026

वाराणसी। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर परियोजना को लेकर एक बार फिर तीखा वैचारिक और सामाजिक विवाद सामने आया है। वरिष्ठ लेखक एवं ‘लोकजतन’ के संपादक बादल सरोज ने आरोप लगाया है कि काशी में चल रहा विकास कार्य केवल सौंदर्यीकरण नहीं, बल्कि हिंदू धर्म की प्राचीन परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और संस्थागत ढांचे को कमजोर करने की सुनियोजित प्रक्रिया है।

लेखक के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी परियोजना काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के नाम पर सैकड़ों वर्षों पुराने मंदिरों, घरों और दुकानों को ध्वस्त किया गया है। स्थानीय नागरिकों के विरोध और पीड़ा को नजरअंदाज करते हुए बुलडोजर कार्रवाई जारी है, जिससे काशी जैसी प्राचीन सभ्यता की पहचान को गंभीर क्षति पहुंच रही है।

बादल सरोज ने काशी को दुनिया के सबसे प्राचीन जीवित शहरों में से एक बताते हुए कहा कि इसकी गलियां, भवन और धार्मिक स्थल केवल संरचनाएं नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सभ्यता, संस्कृति और जीवन-शैली की जीवित विरासत हैं। ऐसे हेरिटेज क्षेत्रों को आधुनिक कॉरिडोर और पर्यटन केंद्र में बदलना संरक्षण नहीं, बल्कि विनाश है।

लेख में दावा किया गया है कि काशी, उज्जैन और अयोध्या में अपनाया गया विकास मॉडल धर्म को आस्था के बजाय व्यवसाय और राजनीति का औजार बना रहा है। लेखक का कहना है कि जब धर्म को धंधे और सत्ता के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो वह अपने मूल स्वरूप को खो देता है।

लेखक ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्व की वैचारिक धारा पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सावरकर और गोलवलकर के संदर्भ में कहा कि जिस ‘नव हिंदुत्व’ की स्थापना की जा रही है, उसका पारंपरिक हिंदू धर्म, उसकी विविधता और दार्शनिक आधार से कोई संबंध नहीं है। शंकराचार्य परंपरा और संत समाज को हाशिए पर डालना इसी प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया है।

प्रयागराज में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुई कथित अभद्रता का उल्लेख करते हुए लेख में कहा गया है कि यह घटनाक्रम हिंदू धर्म की पारंपरिक धार्मिक संरचना को कमजोर करने की दिशा में बढ़ता कदम है, जबकि अपराधों में लिप्त बाबाओं को संरक्षण दिया जा रहा है।

बादल सरोज ने चेतावनी दी है कि हिंदुत्व की यह राजनीति अंततः हिंदू धर्म को ही नष्ट करने वाली ‘भस्मासुर’ प्रवृत्ति साबित हो सकती है। उन्होंने आह्वान किया कि धर्मावलंबियों को धर्म को राजनीति और बाजार के हाथों बंधक बनाए जाने के खिलाफ आवाज उठानी होगी, अन्यथा इसकी कीमत खुद धर्म को चुकानी पड़ेगी।

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