भोजली पर्व: छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, कृषि समृद्धि और भाईचारे का अनोखा पर्व

TEKRAM KOSLE

August 29, 2026

रिपोर्टर टेकराम कोसले

छत्तीसगढ़ कसडोल कुम्हारी। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपराओं में भोजली पर्व का विशेष स्थान है। यह केवल एक धार्मिक या पारंपरिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि, नारी शक्ति, लोकगीत, आपसी प्रेम और सामाजिक भाईचारे से जुड़ा हुआ लोकपर्व है। रक्षाबंधन के आसपास मनाया जाने वाला यह पर्व ग्रामीण अंचलों में आज भी बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। भोजली को स्थानीय मान्यता में देवी स्वरूप मानकर उसकी सेवा और पूजा की जाती है।
भोजली बोना यानी सृजन की शुरुआत
भोजली पर्व की शुरुआत भोजली बोने की परंपरा से होती है। सामान्यतः रक्षाबंधन से लगभग 7 से 9 दिन पहले, नागपंचमी या नवमी के आसपास, बाँस की छोटी टोकरियों अथवा मिट्टी के पात्रों में गंगाजल मिश्रित पवित्र मिट्टी भरी जाती है। इसके बाद इसमें गेहूँ, जौ या धान जैसे अनाज के बीज बोए जाते हैं।
इन पात्रों को घर के स्वच्छ एवं छायादार स्थान पर रखा जाता है। प्रतिदिन देखभाल और पानी देने से कुछ ही दिनों में बीज अंकुरित होकर हरे-पीले रंग की सुंदर भोजली के रूप में विकसित होने लगते हैं।
भोजली देवी की तरह होती है सेवा और पूजा
अंकुरित पौधों को ‘भोजली देवी’ का स्वरूप माना जाता है। महिलाएँ और बालिकाएँ सुबह-शाम भोजली में जल अर्पित करती हैं और पूजा-अर्चना करती हैं। इस दौरान पारंपरिक भोजली गीतों की मधुर गूंज वातावरण को लोकमय बना देती है।
भोजली गीतों में प्रकृति, गंगा, हरियाली और समृद्धि के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। पारंपरिक रूप से गाए जाने वाले गीतों में—
“अहो देवी भोजली, देवी भोजली, गंगा देवी भोजली…”
जैसे लोकगीत प्रमुख हैं। इन गीतों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की पीढ़ियों पुरानी लोकसंस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है।
कृषि और समृद्धि से जुड़ी मान्यता
छत्तीसगढ़ मूल रूप से कृषि प्रधान क्षेत्र रहा है और भोजली पर्व का संबंध भी कृषि संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। ग्रामीण मान्यता के अनुसार भोजली के पौधों की लंबाई, सघनता और रंग देखकर आगामी कृषि वर्ष की उपज एवं समृद्धि का अनुमान लगाया जाता है।
इस प्रकार भोजली केवल पूजा का प्रतीक नहीं, बल्कि धरती, बीज, फसल और किसान के जीवन से जुड़ी भावनाओं का भी प्रतिनिधित्व करती है।
रक्षाबंधन के बाद निकलती है भोजली विसर्जन शोभायात्रा
रक्षाबंधन के अगले दिन भोजली विसर्जन की परंपरा निभाई जाती है। महिलाएँ और बालिकाएँ सिर पर भोजली से भरी टोकरियाँ रखकर समूह में निकलती हैं। पारंपरिक गीत गाते हुए और उत्साह के साथ यह शोभायात्रा गाँव के तालाब, नदी या अन्य जलस्रोत तक पहुँचती है।
वहाँ विधि-विधान से भोजली की पूजा-अर्चना की जाती है और इसके बाद भोजली का विसर्जन किया जाता है। कई स्थानों पर इस अवसर पर पूरा गाँव एक साथ शामिल होता है, जिससे पर्व सामूहिक उत्सव का रूप ले लेता है।
‘भोजली मितान’ की परंपरा है पर्व की सबसे खास पहचान
भोजली पर्व का सबसे भावुक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण पक्ष ‘मितान बदना’ है। भोजली विसर्जन के बाद लोग भोजली की बालियों या पत्तियों को एक-दूसरे के कान के पीछे लगाते हैं। इसके बाद एक-दूसरे को प्रणाम कर आजीवन मित्रता का रिश्ता ‘भोजली मितान’ के रूप में स्वीकार किया जाता है।
यह परंपरा छत्तीसगढ़ी समाज की उस खूबसूरत सोच को दर्शाती है, जिसमें रक्त संबंधों से परे भी प्रेम, विश्वास और निष्ठा के रिश्ते बनाए जाते हैं। भोजली मितान का संबंध जीवनभर निभाने की परंपरा सामाजिक एकता और आपसी भाईचारे को मजबूत करती है।
लोकगीतों में जीवित है छत्तीसगढ़ की संस्कृति
भोजली पर्व के दौरान गाए जाने वाले लोकगीत इस परंपरा की आत्मा माने जाते हैं। इन गीतों में देवी, गंगा, हरियाली, खेती, वर्षा, परिवार और सुख-समृद्धि की कामना दिखाई देती है। विशेष बात यह है कि इन गीतों को किसी लिखित पुस्तक से अधिक लोकस्मृति और मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया गया है।
नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी
आधुनिक दौर में बदलती जीवनशैली के बावजूद भोजली पर्व छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाए हुए है। इस लोकपर्व के माध्यम से बच्चों और युवाओं को अपनी माटी, कृषि, प्रकृति, लोकगीत और सामाजिक परंपराओं से जोड़ने का अवसर मिलता है।
भोजली हमें यह संदेश भी देती है कि संस्कृति केवल उत्सव मनाने का नाम नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और आने वाली पीढ़ियों तक अपनी परंपराओं को सुरक्षित पहुँचाने का माध्यम है।
भोजली पर्व का संदेश
भोजली पर्व प्रकृति के प्रति सम्मान, अन्न और किसान के प्रति कृतज्ञता, महिलाओं की सांस्कृतिक भूमिका तथा आपसी प्रेम और भाईचारे का पर्व है। भोजली की हरियाली जहाँ खेतों की समृद्धि की उम्मीद जगाती है, वहीं ‘भोजली मितान’ की परंपरा समाज में जीवनभर के प्रेम और विश्वास का बीज बोती है।

संपादक { समाचार }

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