महासमुंद का ‘फिल्मी अंदाज़’ वाला बुलू अब नहीं रहा: मुस्कुराहट और अलग अंदाज़ से पहचान बनाने वाला शख्स दुनिया से विदा

MOTI LAL

February 27, 2026

महासमुंद। शहर के कुर्मी पारा क्षेत्र से एक ऐसी शख्सियत हमेशा के लिए विदा हो गई, जिसने अपनी सादगी, मुस्कान और अनोखे फिल्मी अंदाज़ से लोगों के दिलों में खास जगह बनाई थी। भाई बुलू चंद्राकर (लगभग 45-50 वर्ष) का निधन हो गया। उनके जाने की खबर से मोहल्ले सहित पूरे इलाके में शोक का माहौल है।

बुलू चंद्राकर का व्यक्तित्व बेहद अलग और आकर्षक था। लंबे कद, रंगे हुए बाल और दाढ़ी, ढीले-ढाले स्टाइलिश कपड़े, ऊंची हील वाले जूते और आत्मविश्वास से भरी चाल—ये सब उन्हें भीड़ से अलग पहचान देते थे। वे जहां भी खड़े होते, लोग एक नजर जरूर देखते।

मुंबई तक का सफर, फिर लौटकर अपनी राह

बताया जाता है कि 80–85 के दशक में वे बड़े सपनों के साथ मुंबई गए थे। उनका सपना था फिल्मी दुनिया में अपनी पहचान बनाना। हालांकि किस्मत ने साथ नहीं दिया और पैसों से भरा उनका बैग चोरी हो गया। परिस्थितियों ने उन्हें वापस महासमुंद लौटने पर मजबूर कर दिया।

लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। शहर लौटकर उन्होंने आइसक्रीम का ठेला शुरू किया। खास बात यह थी कि वे ठेला भी बड़े शौक और स्टाइल से चलाते थे। ठेला आगे बढ़ाते समय उनका अंदाज किसी फिल्मी हीरो से कम नहीं लगता था। बच्चे हों या बड़े, हर कोई उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होता था।

अनुशासित जीवन और अलग पहचान

कुछ समय बाद उन्होंने ठेला चलाना बंद कर दिया। इसके बाद वे प्रतिदिन कुर्मी पारा से बीटीआई रोड स्थित गुरु गोविंद सिंह उद्यान तक पैदल जाया करते थे। दिन में तीन-तीन बार पैदल चलना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था।

उनकी वेशभूषा भी हमेशा चर्चा में रहती थी—ढीले-ढाले डिजाइनर कपड़े, ऊंची हील के जूते और सलीके से सजे बाल-दाढ़ी। वे अपने व्यक्तित्व को लेकर बेहद सजग रहते थे।

हर त्योहार पर अलग रंग

बुलू चंद्राकर का एक और खास शौक था—संगीत। हर त्योहार पर वे अपने माइक्रो टेप रिकॉर्डर और साउंड सिस्टम के जरिए माहौल को जीवंत बना देते थे। पर्व के अनुसार गीत बजाना और लोगों को आकर्षित करना उनका अंदाज था। इसी वजह से वे मोहल्ले में हमेशा चर्चा का विषय बने रहते थे।

निजी जीवन में बड़ा आघात

कुछ माह पूर्व उनकी पत्नी का भी निधन हो गया था। इस गहरे सदमे के बावजूद वे खुद को संभाले हुए थे। अब उनके अचानक चले जाने से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।

शहर ने खोया एक अनोखा चेहरा

बुलू चंद्राकर भले ही किसी बड़े मंच के सितारे नहीं बन पाए, लेकिन महासमुंद की गलियों में वे अपने अंदाज के ‘हीरो’ जरूर थे। उनकी मुस्कुराहट, चाल और अलग स्टाइल लोगों की यादों में हमेशा जीवित रहेगी।

ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोकाकुल परिवार को इस कठिन समय में संबल दें।

प्रधान संपादक

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