भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते पर घमासान किसानों के हितों को लेकर वामपंथ का तीखा हमला

SARJU PRASAD SAHU

February 22, 2026

नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच घोषित अंतरिम मुक्त व्यापार समझौते को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के पोलित ब्यूरो सदस्य एवं अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव वीजू कृष्णन ने इस समझौते को “असमान और एकतरफा” करार देते हुए केंद्र सरकार पर देश की संप्रभुता और किसानों के हितों से समझौता करने का आरोप लगाया है। लेख का हिंदी अनुवाद संजय पराते ने किया है।

 

 

 

 

 

 

समझौते पर उठे सवाल

वीजू कृष्णन ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री Narendra Modi ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की घोषणाओं का समर्थन करते हुए ऐसे व्यापारिक प्रावधानों पर सहमति दी है, जिनसे भारत के कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उनका दावा है कि अमेरिकी पक्ष ने 18 प्रतिशत “पारस्परिक शुल्क” लागू करने की बात कही है, जबकि भारत अपने कई उत्पादों पर शुल्क शून्य करने और गैर-शुल्क बाधाएं हटाने को तैयार हुआ है।

 

लेख में यह भी कहा गया है कि अमेरिका से ऊर्जा, कृषि, प्रौद्योगिकी और अन्य उत्पादों की बड़े पैमाने पर खरीद का वादा किया गया है, जिससे भारत को अगले पांच वर्षों में लगभग 500 अरब डॉलर की खरीद करनी होगी।

कृषि क्षेत्र पर संभावित असर

वीजू कृष्णन ने विशेष रूप से किसानों की स्थिति पर चिंता जताई है। उनके अनुसार अमेरिका में किसानों को भारी सब्सिडी मिलती है, जबकि भारत में प्रति किसान सब्सिडी अपेक्षाकृत बेहद कम है। ऐसे में शुल्क मुक्त आयात से भारतीय किसानों, विशेषकर कपास, सोयाबीन और अन्य नकदी फसलों के उत्पादकों पर दबाव बढ़ेगा।

कपास आयात को लेकर चिंता

लेख में उल्लेख किया गया है कि भारत में कपास आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है और अमेरिका प्रमुख निर्यातक बनकर उभरा है। सरकार द्वारा आयात शुल्क में छूट दिए जाने के बाद अमेरिकी कपास आयात में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। आशंका जताई गई है कि इससे घरेलू बाजार में कीमतों में गिरावट आएगी और पहले से संकट झेल रहे किसानों की आर्थिक स्थिति और बिगड़ेगी।

सरकार का पक्ष

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री Piyush Goyal ने स्पष्ट किया है कि कृषि क्षेत्र के हितों से समझौता नहीं किया जाएगा और व्यापार संतुलन को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिए गए हैं। उनका कहना है कि अमेरिका से कच्चा कपास आयात कर तैयार वस्त्रों का निर्यात शून्य प्रतिशत शुल्क पर संभव होगा, जिससे भारतीय उद्योग को लाभ मिलेगा।

वामपंथी दलों का विरोध

माकपा और संयुक्त किसान मोर्चा सहित विभिन्न किसान और श्रमिक संगठनों ने इस समझौते के खिलाफ आंदोलन की चेतावनी दी है। 12 फरवरी को देशभर में विरोध प्रदर्शन किए गए और 24 मार्च को “दिल्ली चलो” अभियान की घोषणा की गई है। संगठनों का कहना है कि यह समझौता कृषि कानूनों की तरह ही किसानों को बाजार के हवाले कर देगा।

व्यापक बहस की मांग

विरोधी पक्ष का आरोप है कि इतने महत्वपूर्ण समझौते पर संसद और राज्यों से व्यापक विचार-विमर्श नहीं किया गया। वहीं सरकार इसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति मजबूत करने वाला कदम बता रही है।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अब राजनीतिक और आर्थिक बहस तेज हो गई है। आने वाले समय में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़कों तक गर्माने के संकेत दे रहा है।

सह संपादक

Share this content:

Leave a Comment