बलौदाबाजार, 9 अक्टूबर 2025/
भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में मान्यवर कांशीराम जी का नाम सदैव सम्मानपूर्वक लिया जाता रहेगा।
वे न केवल एक राजनेता थे, बल्कि सामाजिक क्रांति के ऐसे प्रणेता थे जिन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर के अधूरे मिशन – “सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता” – को जन-जन तक पहुँचाया।
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🌿 जीवन परिचय
कांशीराम जी का जन्म 15 मार्च 1934 को रोपड़ जिले के खवासपुर गाँव (पंजाब) में एक दलित (रामदासी सिख) परिवार में हुआ था।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा सरकारी स्कूल में हुई और बाद में उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज रोपड़ से बी.एससी. की उपाधि प्राप्त की।
स्नातक के बाद वे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत रहे।
यही वह समय था जब उन्होंने समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव को गहराई से महसूस किया।
उनके एक सहकर्मी दलित कर्मचारी के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया।
तभी उन्होंने यह निश्चय किया कि वे अपना पूरा जीवन दलितों, पिछड़ों और शोषित वर्गों के अधिकारों के लिए समर्पित करेंगे।
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🔹 संघर्ष और आंदोलन की शुरुआत
कांशीराम जी ने 1971 में बामसेफ (BAMCEF) की स्थापना की — जिसका पूरा नाम था
“Backward And Minority Communities Employees Federation.”
इस संगठन का उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों को सामाजिक चेतना से जोड़ना और उन्हें समाज के पुनर्निर्माण में सक्रिय बनाना था।
इसके बाद 1981 में उन्होंने DS4 (दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) की स्थापना की, जिसने दलित समाज को राजनीतिक दिशा दी।
1984 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) की स्थापना की —
जिसका नारा था:
> “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।”
यह नारा भारत के लोकतांत्रिक और सामाजिक ढांचे को वास्तविक समानता की दिशा में ले जाने का आह्वान था।
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🌺 राजनीतिक योगदान
कांशीराम जी ने दलितों और पिछड़े वर्गों को यह अहसास कराया कि जब तक राजनीतिक सत्ता उनके हाथों में नहीं होगी,
तब तक सामाजिक समानता केवल एक सपना ही रहेगी।
उनके नेतृत्व में बसपा धीरे-धीरे एक मज़बूत राजनीतिक शक्ति बनी।
उनकी रणनीति और विचारधारा ने उत्तर प्रदेश सहित देशभर में बहुजन राजनीति की नई धारा को जन्म दिया।
उनकी शिष्या बहन मायावती जी को उन्होंने आगे बढ़ाया और सत्ता तक पहुँचाया —
जो इस बात का प्रमाण है कि उनका उद्देश्य व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं बल्कि सामूहिक सशक्तिकरण था।
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🕊️ विचार और दर्शन
कांशीराम जी कहा करते थे —
> “हमारा संघर्ष किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, व्यवस्था के खिलाफ है।”
वे मानते थे कि समाज में परिवर्तन केवल शिक्षा, संगठन और संघर्ष से संभव है।
उनकी यह सोच आज भी लाखों युवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनैतिक नेताओं को प्रेरित करती है।
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🌼 पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि
आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर हम उन्हें नमन करते हैं।
उनके दिखाए मार्ग पर चलकर ही समाज में समानता, न्याय और भाईचारा कायम किया जा सकता है।
कांशीराम जी का जीवन हम सबको यह सिखाता है कि—
> “परिवर्तन की शक्ति जनमानस में छिपी होती है, बस उसे जगाने वाला एक नेतृत्व चाहिए।”
काफी प्रेरणादायक ख़बर है, पढ़कर अच्छा लगा ✨”
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