ट्रंप की टैरिफ़ नीति साम्राज्यवादी दबाव और ‘टैरिफ आतंकवाद’ का नया चेहरा

SARJU PRASAD SAHU

October 15, 2025

अर्थशास्त्र की पाठ्य पुस्तकों के अनुसार, कोई देश तभी टैरिफ लगाता है जब उसे विदेशी वस्तुओं से अपने घरेलू उत्पादन की रक्षा करनी होती है। लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति इस सामान्य अर्थशास्त्रीय परिभाषा से कहीं आगे जाकर वैश्विक दबाव की रणनीति बन चुकी है।ट्रंप के टैरिफ अब किसी सैन्य हस्तक्षेप या राजनीतिक तख्तापलट की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं। भारत के वस्त्र निर्यातों पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाना इसका उदाहरण है। यह अमेरिकी उत्पादकों की सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि भारत पर राजनीतिक दबाव बनाने की कवायद है।रूस से तेल खरीदने की कथित सजा के तौर पर लगाए गए इन टैरिफों में विडंबना यह है कि रूस से ऊर्जा का सबसे बड़ा आयातक भारत नहीं, बल्कि चीन है। फिर भी चीन पर यह कठोरता नहीं दिखाई गई। इसका कारण यह है कि चीन जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता रखता है, जबकि भारत ने ऐसी कोई चेतावनी नहीं दी है।ब्राजील का मामला और भी विचित्र है। वहां के मालों पर 50 फीसद टैरिफ इसलिए लगाए गए कि वहां पूर्व राष्ट्रपति बोल्सोनारो के खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं। इस तरह भारत और ब्राजील दोनों को इस नीति के ज़रिए एक संभावित तीसरी दुनिया के गठजोड़ से अलग करने की अमेरिकी कोशिश झलकती है।नियंत्रणात्मक रणनीति और उसका पतनटैरिफों को हथियार बनाना साम्राज्यवाद की एक नई कार्यनीति बन चुकी है। निरुपनिवेशीकरण के बाद तीसरी दुनिया के देशों ने आत्मनिर्भरता पर आधारित “नियंत्रणात्मक रणनीति” अपनाई थी—जो घरेलू उत्पाद, राज्य नियंत्रण और सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका पर टिकी थी। लेकिन विश्व बैंक और आईएमएफ जैसी संस्थाओं ने इसे धीरे-धीरे कमजोर किया।भारत ने इस दबाव का अंत तक प्रतिरोध किया, पर 1991 में आर्थिक उदारीकरण के तहत उसे भी झुकना पड़ा। तब से यह तथाकथित “नियम आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था” असल में विकसित देशों की आर्थिक प्रभुता का औजार बन चुकी है।साम्राज्यवादी शिकंजा और उसकी कीमतइन टैरिफों से सबसे अधिक नुकसान तीसरी दुनिया के श्रमिकों और किसानों को हो रहा है। भारतीय कपड़ा उद्योग में लाखों मजदूरों की आजीविका पर संकट है, जबकि घरेलू नीति कदम भी किसानों के हित में नहीं हैं। आयातित कपास पर शुल्क हटाना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और कमजोर कर रहा है।आत्मनिर्भरता ही सामाधानलेखक का तर्क है कि अब भारत को अपने विकास पथ को पुनर्परिभाषित करना होगा। जरूरी है कि विकास रणनीति घरेलू बाजार, आय के पुनर्वितरण, भूमि सुधारों और कल्याणकारी खर्च को प्राथमिकता दे। जीएसटी रियायतें इस दिशा में पर्याप्त कदम नहीं हैं क्योंकि वे कामगार वर्ग या किसानों के बजाय दूसरे वर्गों को लाभ पहुंचा रही हैं।साथ ही, ट्रंप के टैरिफों से प्रभावित उद्योगों के लिए वैकल्पिक बाजारों की तलाश और संभावित जवाबी नीति बनाना आवश्यक है। चीन और ब्राजील जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि प्रतिरोध भी एक विकल्प है।अंततः, यह लेख चेतावनी देता है कि यदि भारत अपनी आत्मनिर्भर नीति पर नहीं लौटता, तो साम्राज्यवादी टैरिफ आतंकवाद अंततः उसकी अर्थव्यवस्था को और जकड़ लेगा।

 

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