उचित खानपान एवं योगाभ्यास से होगा ठंड से बचाव — योगाचार्य मिथलेश सिन्हा
गायत्री मंदिर छुरा में नियमित लगने वाले निःशुल्क योग कक्षा में योगाचार्य मिथलेश सिन्हा द्वारा शीत ऋतु हेतु जानकारी दी गई
छुरा /गरियाबंद :- जैसे-जैसे ठंड बढ़ रहा है, शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखने के लिए उचित खानपान और नियमित व्यायाम बेहद ज़रूरी हो गया है। योगाचार्य मिथलेश सिन्हा ने बताया कि सर्दियों में शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए तिल, गुड़, गोंद, मूंगफली, सूखे मेवे, हरी सब्ज़ियाँ और मौसमी फल आहार में शामिल करना चाहिए। साथ ही प्रातःकाल सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और हल्के व्यायाम करने से रक्तसंचार बेहतर होता है और ठंड से बचाव में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि नियमित योगाभ्यास से न केवल शरीर गर्म रहता है बल्कि मानसिक स्फूर्ति और संतुलन भी बना रहता है।
शीत काल में आहार-विहार
श्री सिन्हा ने बताया कि स्वास्थ्य की दृष्टि से शीत काल की ये दो ऋतुएँ मनुष्य के लिए सबसे अधिक अच्छी मानी गई हैं। इस समय शरीर सबसे अधिक बलयुक्त होता है। दिन छोटे तथा रातें लम्बी होने के कारण शरीर को आराम करने के साथ-साथ भोजन के पाचन के लिए भी अधिक अनुकूलता मिलती है। इन दोनों कारणों से सर्दी में अधिक पुष्टि मिलती है तथा भूख भी अधिक लगती है। इस प्रकार पाचन शक्ति तेज होने से भारी और अधिक मात्रा में लिया गया आहार भी आसानी से पच जाता है। अतः इस काल में भूखा रहना और रूखा सूखा भोजन खाना हानिकारक है। पर्याप्त मात्रा में भोजन रूपी ईंधन न मिलने पर पाचक अग्नि शरीर की धातुओं का ही भक्षण करने लगती है। इससे शरीर में वात दोष बढ़ जाता है। वात में शीत और रूक्ष गुण की अधिकता होती है।
पथ्य आहार
शीत ऋतु में चिकनाई, मधुर, लवण और अम्ल (खटाई) रस युक्त तथा पोषक तत्त्वों वाले पदार्थों का सेवन करना चाहिए। इन पदार्थों में शुद्ध घी,मक्खन, तेल, दूध, दूध-चावल की खीर, उड़द की खीर, मिश्री, रबडी, मलाई, ठण्डे दूध के साथ शहद, गन्ने का रस, दलिया, हलवा, आँवले व सेब का मुरब्बा, मेवों से बने पदार्थ, मिठाई आदि उपयोगी हैं। अनाजों में अंकुरित चना, मूँग, उड़द, गेंहूँ या चने की रोटी, कार्नफ्लैक्स, वर्षभर पुराने चावल, मौसमी फल जैसे सेब, आँवला, संतरा आदि। सब्जियों में परवल, बैंगन, गोभी, जिमीकन्द, पके लाल टमाटर, गाजर, सेम, मटर, पालक, बथुआ, मेथी आदि हरे शाक, सोंठ, गर्म जल व गर्म पदार्थ स्वास्थ्यवर्धक और पोषक होते हैं।
पथ्य विहार
पथ्य आहार के साथ पथ्य विहार (रहन-सहन) को भी ठीक तरह से अपनाना आवश्यक है। सबसे पहले तो मन प्रसन्न और चिन्तारहित होना चाहिए। प्रातः काल सूर्योदय से पहले उठ कर उषःपान, शौच, स्नानादि करके शुद्ध वायुसेवन के लिए भ्रमण करना चाहिए। अपनी शक्ति के अनुसार तेज चाल से चलना उचित है। लौट कर थोड़ा विश्राम करके व्यायाम और योगासन आदि करने चाहिए। इस ऋतु में व्यायाम का विशेष रूप से लाभ होता है। इससे शरीर बलवान् एवं सुडौल बनता है, खाया-पिया ठीक प्रकार पच जाता है। तेल मालिश, उबटन (हल्दी का) व सिर पर तेल मलना खास उपयोगी है। सरसों के तेल की मालिश से त्वचा, सुन्दर और निरोग बनती है तथा फोड़े, फुंसियाँ नष्ट होते हैं। तेल में कपूर डाल कर मालिश करने से जोड़ों का दर्द और गठिया आदि में आराम मिलता है। मालिश के बाद उबटन करना चाहिए। व्यायाम तेल मालिश के बाद भी किया जा सकता है।
इस मौसम में ठण्ड लगने से जुकाम, बुखार, निमोनिया आदि हो सकते हैं। त्वचा रूखी होती है तथा शीतल वात से खाँसी, श्वास, गठिया जोड़ों का दर्द, खुजली आदि हो सकते हैं। अतः ठण्डी हवा से बच कर रहना चाहिए। ताप वाले स्थान में रहना व सोना चाहिए। भारी, गर्म कपड़ों, कम्बल, रजाई, सूती व ऊनी वस्त्रों को पहनना व ओढ़ना चाहिए। बिस्तर व वाहन आदि अच्छी तरह ढके होने चाहिए। अग्नि और धूप सेकना लाभदायक है। धूप पीठ की ओर से तथा आग सामने से सेकनी चाहिए। कमरा गर्म करने के लिए रूम हीटर आदि का प्रयोग किया जा सकता है।रात को सोते समय दूध व वृष्य पदार्थों का सेवन लाभदायक है।
अपथ्य आहार-विहार
शीत-ऋतु में हल्के, रूखे, वातवर्द्धक पदार्थों, कटु, तिक्त और कषाय रस वाले खाद्य एवं पेय पदार्थों, बासी तथा ठण्डे (आइस्क्रीम व ठण्डी प्रकृति वाले) पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। खटाई में इमली, अमचूर, खट्टा दही, आम के अचार आदि का सेवन कम से कम ही करना चाहिए।
देर रात तक जागना, सुबह देर तक सोये रहना, आलस्य में पड़े रहना, श्रम और व्यायाम न करना, देर तक भूखे रहना, अधिक स्नान, बहुत ठण्ड सहना, रात को देर से भोजन करना और भोजन के तुरन्त बाद सो जाना, ये सब अपथ्य विहार हैं, जिनसे बचकर रहना चाहिए।